आज आचार्य अत्रे यांचा स्मृतिदिन. आजच्या मराठी वाचकाला (केवळ whatsapp सोडुन) केशवकुमार कोण आणि केशवसुत कोण हे ठाऊक जर असेल तर प्रश्नच उद्भवत नाही! केशवसुतांनी कवीचे श्रेष्ठत्व सांगण्यासाठी लिहिलेली अचाट प्रतिभेची कविता वाचून थोर साहित्यिक, पत्रकार, नाटककार, टीकाकार, कवी, शिक्षणशास्त्रज्ञ, राजकारणी, प्रभावी वक्ता आणि महान विनोदी लेखक, विडंबनकार प्रल्हाद केशव अर्थात आचार्य अत्रे यांनी लिहिलेली ही त्यावरील विडंबनकविता वाचून हंसून पोट दुखले नाही असं वाचक एकेकाळी एकही नसावा.
Nandan G Herlekar Articles and some videos
The purpose of this blog is to highlight some important points of ancient Indian Music through write ups and articles. There is a wide variety of musical thoughts, instruments and styles Here some old articles are re-written with new references. My published books are - The Beginners' Book On Hindustani Music (2 Editions), Tabla - Principles And Art, Naad Rang (Marathi) and Vaadye Nanapari (marathi). Exploring path is always enjoyable.
Saturday, June 13, 2026
केशवकुमार, अर्थात आचार्य अत्रे
Monday, June 1, 2026
Pt. V A Kagalkar,Celebrated Gavai of Yesteryears
(Photo credit Rajan Parrikar Archieves)
Pt. V A Kagalkar (1902-1972)
The first president of Sangeet Kalakaar Sangh, Belgaum
This went on and till my 10th class examination and for many
years I listened to Pt. Kagalkarbuva in Maniknagar.
Though he stayed in Belgaum, I don’t remember any concert where he performed. My father used to meet him, attended his concerts, invited him many times in our Vithal Mandir. Talim Master Baluanna Deulkar also was fond of his singing.
President
SKS
Wednesday, April 1, 2026
बळवंतराव अर्थात अण्णासाहेब किर्लोस्कर
Saturday, October 4, 2025
संगीत श्रोता किसे कहे?
अभ्युदय
संगीत श्रोता का
लेखन – नंदन हेर्लेकर
संगीत की किसी भी शाखा
का अध्ययन करने से पहले
अभ्यासक को एक उत्तम श्रोता बनने की आवश्यकता होती है | जो विद्यार्थी अनेक वर्षो तक अच्छा संगीत
सुनने के पश्चात अपनी खुद की इच्छा के अनुसार संगीत सीखना प्रारंभ करता है, उसके मन
पर सूर-लय-ताल के अच्छे संस्कार हो जाते हैं| संगीत की शिक्षा लेने के लिए आवश्यक मेहनत का प्रमाण, बुद्धि, उमर, और उसके निर्धार की कसौटी की परीक्षा हो जाती है|
अर्थात एक सामान्य श्रोता की भूमिका से प्रत्यक्ष कला का आविष्कारक होने तक का उसका
प्रवास बडा रोचक हो जाता है| एक सक्षम कलाकार के बनने में अनेक वर्षो की तपस्या की आवश्यकता होती है| कच्ची उम्र में संगीत शिक्षा का आरम्भ करने का फायदा तब दीखता
है जब युवावस्था में ही वह मंचासीन हो जाता है|
जहां जहां उत्तम श्रोता
है, वहां अच्छा संगीत उपजता है, फुलता है तथा उस नगर की प्रसिद्धी अल्प समय में नजदीक के क्षेत्र में होने लगती है|
वहां जितना महत्व कलाकार का होता है, उतना या उससे भी अधिक अच्छे श्रोता का है| वह
श्रोता भी जानकार, मर्मज्ञ और बहुत संयमशील होता है| संयमशील इसलिए कि ऐसा श्रोता एक
कलाकार को उभरने के लिये पूरा समय मिलें, उसके गुणो को विकसित होने का अवसर मिलें,
सटीकता से दोषो का निराकरण करनेवाले मार्गदर्शक को पूरा सहयोग मिलें, इन सारी बातों
पर ध्यान देनेवाला होता है| विद्वान गुरु के समक्ष उसका
ज्ञानार्जन कितनी गहनतासे हो रहा है, उसपर भी उसका ध्यान होता है| केवल ऐसा श्रोता ही कलाकार की कलाप्रस्तुती का सही रसग्रहण कर सकता
है| रसिकता उसका स्थायी गुण होता है| परन्तु रसिक, जानकार, मर्मज्ञ बनने से पहले उसे केवल एक उत्सुक श्रोता होना बहुत जरुरी
है|
वैसे देखा जाएं तो संगीत
सुनने की भी एक कला है| कला का आस्वाद लेना यह उसकी अगली कडी है| आस्वाद लेते समय उस कला का तकनीकी मर्म समझने की भी जरुरत
नहीं होती| सुंदरता का स्पर्श जिसको
महसूस होता हो, वही रसिक कहलाता है|
अभिजात हिंदुस्तानी संगीत का आस्वाद लेने की चाहत रखनेवाले को पहले सुनने की आदत होनी चाहिये|
पहले पहले उसे यह संभ्रम
होता है कि इतने सारे लोग एक घंटे से भी अधिक समय तक चलनेवाले ‘आ....ऊ...’ जैसी आवाजों को कैसे सुनते बैठते हैं! कविता
के समान एकाध शब्द को पुनरावर्तित करते हुए होनेवाले गायन को क्यों दाद देते रहते हैं? तबला बजानेवाला एक जैसा ‘बीट’
बजाते रहता है, अचानक कभी कभी जबरदस्त आवाजें
तबले से निकालता है
और जब सारे लोग जोरजोरसे ‘वाहवाह’ कहते हैं, उसी समय फिरसे वही पुराना धीमा ‘बीट’
बजाना शुरू कर देता है|
पहली बार गायन सुननेवालेको यह सबकुछ बड़ा अजीबसा लागता है| उसके मन में गूढता निर्माण हो जाती है| इस
गूढता की खोज करना उसकी एक जिम्मेदारी बन जाती है| धीरेधीरे उस गूढता की पहल उसे सूझने
लगती है| एकही बार जाकर शास्त्रीय संगीत सुननेवाले उस महाशय को अब फिरसे गायन सुनने की इच्छा हो जाती है| पहली बार सुनी हुई
कुछ मजेदार बात उसे फिरसे शायद ही सुननेको मिलती है, परन्तु उससे भी कुछ अलग परन्तु
मनको भानेवाली बात उसको आनंद देती है| कभी कभी पुन:प्रत्यय
का आनंद भी मिल जाता है| उसी क्षण से उसके मनको संगीत की कुछ कुछ समझ आने की संभावना
शुरू हो जाती है| पहले सुनी हुई कोई हरकत फिरसे सुनने के पश्चात उसकी समझ और सुधर जाती
है, कुछ शब्दों से वह परिचित होने लगता है| हरबार उसे नयी अनुभूति हो जाती है| उसको यह समझ में आने लगता है कि शास्त्रीय संगीत ‘मोनोटोनस’
न हो कर उसमें हरक्षण नवीनता होती है, नयी नयी कल्पनाओं
का सृजन उसके अंदर होते रहता है, तथा शास्त्रीय
संगीत में सूर, ताल तथा
प्रमाणबद्ध तरीके का चक्राकार भ्रमण होते रहता है|
अब अनेक कार्यक्रम सुनने पश्चात कुछ प्रमाणित शब्द, पद्धतियाँ, तालें,
स्वरनाम, रागों के नाम इन सारी बातों का परिचय उसे होने लगता है| फिर कुछ अनुभव के
आधार पर महफ़िल का वर्णन वह अपने शब्दों में करने का प्रयास करने लगता है| खुद को
‘रसिक’ कहलाने में उसे आनंद मिलने लगता है| कुछ चुने हुए रागों का भी परिचय उसे होने लगता है| सर्वसामान्य
श्रोता की तरह इस अवस्था में कविता (बंदिश) का आधार लेकर ही उसे राग पहचानना संभव
हो जाता है, जैसे ‘एरी आली पियाबिन’ यानि यमन, ‘कान्हा रे’ यानि केदार, ‘लंगर
कांकरिया’ यानि तोड़ी, ‘जागो मोहन प्यारे’ यानि भैरव वगैरह|
रागदारी संगीत को
समझने की यह पहली सीढ़ी है!! शब्दप्रधानत्व यह गायन कला की रीढ़ की हड्डी है|
शास्त्रीय संगीत में भी शब्दबहुलता अपना महत्व रखती है| इसी के फलस्वरूप ऐसा
श्रोता गायक कौन सी चीज गा रहा है, इसी बात पर ध्यान देता है, ना कि चीज कैसी गया
रहा है| इसीलिए इस मनोवस्था में स्वरों का यथोक्त परिचय ना होने के कारण कोई और
बंदिश की प्रस्तुती होने पर उसे राग समझने में कठिनाई हो जाती है| इस गतिविधि को
हम कहेंगे कि राग का नादमय परिचय ना होना| रागों का नादमय होने के लिए ऐसे श्रोता
को कुछ और इंतजार करना पड़ता है| श्रवणसातत्य के होने से स्वरों की नजदीकी समझ में
आनी लगती है| स्वरों का आशय उलगने लगता है| इसके बाद ही स्वरप्रधान गायकी का मर्म
उसकी अंतरशक्ति में प्रवेश करने लगता है| यही क्षण है, जब उसका ‘सुनना’ सही में
प्रारंभ होता है| ‘ख्याल’ का मतलब समझ में आने लगता है| इसी अवस्था में गानेवाले
के ‘ख्याल’ में वह बहने लगता है| ख्याल समझने की परिपक्वता, योग्य मनोभूमिका तैयार
होने लगती है| राग का सौंदर्यतत्व समझने की आगे की सीढ़ी वह चढ़ जाता है|
इस अवस्था में भी
उसका ध्यान सर्वपरिचित रागों की तरफ होता है| ऐसे रागों की खास स्वरपंक्ति उसके
कर्णरंध्रों में भारी रहती हैं| जैसे कि बागेश्री सुनते समय वह’ ‘मपध मग रे
सा’ सुनने की आतुरता रखता है| ख्याल सुनने की सही आदत के कारण उसे अब कईं स्वरनाम
याद होने लगते हैं| केवल आकार की आलापी से स्वर पहचान लेने की प्रगति भी हो जाती
है| बंदिश को सुनकर राग पहचानने की उसकी आदत अब नष्ट होकर केवल स्वरों की पकड़
सुनने के तत्क्षण राग पहचानने तक सुधर जाती है| राग विस्तार की कल्पना अपने स्वयं
के गुनगुनने तक उसकी प्रगति हो जाती है| गर आवाज अच्छी हो तो परिचित राग की
सुरावटें वह खुद गाने लगता है| अबतक अनेकों का गायन सुनने के कारण उसके गुनगुनने
में भी कुछ वजन आ जाता है| शब्दों का आकर्षण अधिक होने के कारण अनेकों से सुनी हुई
चीजें हूबहू गाने की क्षमता उसमें आ जाती है| ‘कोठीवाले गवैयों’ जैसी उसकी भी
‘कोठीवाले श्रोता’ की प्रतिमा प्रसिद्ध होने लगती है| (एकएक राग की सैंकड़ों
बंदिशें गानेवाले गवैये को एक जमाने में ‘कोठीवाले गवई’ कहा जाता था)| पुणे नगरके
सुप्रसिद्ध आबासाहेब मुजूमदार, बेलगांव के देउलकर मास्टर या कुंदगोल के देसाई
अण्णा जैसे गणमान्य श्रोता हरेक सुसंस्कारित नगरी में होते हैं| उनकी संगीत सुनने
की अमीरी इतनी होती है, कि ‘रसिकों के राजा’ कहलानेवाले बड़े बड़े कलाकार भी ऐसे
श्रोताओं के उपस्थित ना होनेपर नाराज हों| गाते समय अगर ऐसी कोई व्यक्ति महफ़िल में
आ जाएं तो गाने का रंग अधिक गहरा हो जाता हों| मैंने स्वयं अनुभव किया है कि कुमार
गंधर्व हों या भीमसेनजी, देउलकर मास्टर के आने तक अपना गायन भी प्रारंभ नहीं करते
थे| ऐसे रसिक श्रोताओं की भी स्मरणशक्ति इतनी सूक्ष्म होती है कि बरसों बाद भी उसी
दिन का समय, गाया हुआ राग और गायी हुई बंदिशें हुबहूँ वे गा कर सुनाते हैं| एक
पीढ़ी ऐसी थी कि जब उनके पास ना टेप रिकार्डर था, ना कोई और सामान! परंतु बंदिशें
तो सुनकर ही रट ली थीं उन्होंने!!
नयें कलाकारों को
ऐसी व्यक्ति हमेशा आदरणीय होती है| जबही मौका मिलें, उनसे मिलने या गप्पे लगानी की
वे राह देखते हैं| कोई उत्साह के साथ या कोई कुछ मानसिक दबाव में उनके सामने अपनी
कला को प्रस्तुत करते हैं तथा उनकी राय जान लेते हैं| मार्गदर्शन प्राप्त कर लेते
हैं| ऐसी व्यक्ति उस कलाकार का जोश बढ़ाने का काम जरूर करती है| ओंकारनाथ ठाकुर,
सलामत नझाकत, बड़े गुलाम अली, छोटा गन्धर्व, अहमदजान थिरकवा, राम मराठे, अमीरखाँ,
रवि शंकर, अली अकबर, यशवंतबुवा जोशी जैसे महान कलाकारों का संगीत सुने हुए श्रोता
जब ऐसे युवा कलाकारों के सम्मुख अपने अनुभव बताते हैं, तब यूट्यूब से भी बढ़कर उन कलाकारों
का चरित्र उनके सामने आ प्रकटता है| कभीकभी उनकी सारी विशेषताओं का प्रात्यक्षिक
ऐसे बुजुर्गों से नई पीढ़ी को प्राप्त हो जाता है| हर्ष, विषाद, दुख, कारुण्य,
विरह, मिलन जैसे सारे भाव गतपीढ़ी के महनीय कलाकारों के गायन के द्वारा कैसे प्रतीत
होते थे, इसका सही वर्णन ऐसे बुजुर्ग श्रोताही कर सकते हैं| ‘जहाँ हमारी नजर नहीं
पहुँचती, वहाँ आपका स्वर पहुंचता है’ जैसे वर्णनात्मक वाक्य भी ऐसे सम्माननीय
श्रोताओं के मुख से सुनने को मिलते हैं| उनके वर्णन करने की क्षमता को देखकर सच्चे
संगीतप्रेमी की आँखों में आँसु आ जाते हैं|
सच्चे श्रोता की
मनोभूमिका को समझने के लिए हम अब अकबर के दरबार में पहुंचेंगे|
सम्राट का
संगीतप्रेम देख कर सारे दरबारिओं का संगीतप्रेम चरमसीमा पर पहुँच गया| जो भी कोई
तानसेन को देखें, ‘वाहवाह’ की बरसात करने लगा| तानसेन के स्वर लगाने से पहले ही
वाहवाही की खैरात सुनकर सम्राट का क्रोध बढ़ गया| उसने हुकूम छोड़ दिया कि इसके बाद
‘वाहवाह’ करनेवाले की गर्दन उड़ाई जाएगी|
हर जगह समशेरधारी
खड़े हो गएँ| अपूर्व शांति में तानसेन का गायन रंग भरने लगा| उसके स्वरों की नशा से
मानो सारा माहौल विस्मयचकित हो गया| स्वरसम्राट तानसेन के स्वरों का भराव जैसेजैसे
उत्कंठा से गूंजने लगा, तब अचानक एक कोने से ‘वाहवाह!’ सुनाई दी| समशेर उठ गई|
सारा दरबार डर गया| सम्राट ने सैनिक की उठी समशेर को रोक दिया और उस दरबारी को आगे
आ जाने का हुक्म दे दिया| डर के मारे कांपता हुआ वाह सबके सामने आ गया| सम्राट ने
कहा, “मृत्यु को देखते हुए भी तुम्हारा सच्चा संगीतप्रेम देख कर मैं खुश हूँ| आज
से तुम वहाँ पीछे नहीं, संगीत के सम्राट तानसेन के बिल्कुल सामने बैठकर गायन
सुनोगे”| धन्य वह तानसेन और धन्य वह श्रोता!!
यह हकीकत हों या
किंवदंती| असली श्रोता की मनोभूमिका स्पष्ट करनेवाली यह बात है, इसमें कोई संदेह नहीं|
लेखन - नंदन
हेर्लेकर
Friday, May 23, 2025
राग समय के बारे में
संगीत श्रोतावलम्बी कला है। गायन, वादन या
नर्तन की प्रस्तुति रसिकों, गुनिजनों या ज्ञानी अभ्यासकों के
समक्ष हों तो कलाकार की अभिव्यक्ति में चार चाँद लग जाते हैं। ‘’स्वांत:सुखाय’’ संगीतराधना केवल रियाज़ के समय ठीक
है। ऐसे भी कलाकार हैं, जिन्हे अपने रियाज़ के समय भी
श्रोताओं की उपस्थिति आवश्यक लगती है। जब गुरुजन अपना रियाज़ करते हैं तब अन्य
श्रोताओं के बजाय केवल शिष्यों का होना दोनों पक्षों के लिए अनुकूल होता है। वैसे
संगीत की शिक्षा ‘’सीना ब सीना’’ होने
की परम्परा है। गुरू-शिष्यों के सह जीवनक्रम की आवश्यकता संगीतविद्याग्रहण के
साथ-साथ शिष्य के अन्य जीवनावश्यक घटनाओं
की परिपूर्णता के लिए भी महत्व रखती है। संगीत के ‘’घराना’’ या विरासत को अक्षुण्ण रखने में गुरुगृह में ही शिष्यों का निवास होना एक
समय में आवश्यक हुआ करता था। आज जितनी भी गायन/वादन/नर्तन परम्पराएँ विद्यमान हैं, उनके विकास में यही सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आ रहा है।
आज के जमाने में संगीत का जो स्तर है, उसको
अनुभव करते हुए अनेक प्रश्नों का उपस्थित होना और उसका योग्य निराकरण होना जरूरी है। आजकल का सबसे अधिक पूछा जानेवाला प्रश्न यह
है कि
क्या शास्त्रीय संगीत का
लोप हो रहा है?
इसका उत्तर ढूँढते समय एक बात को समझना होगा
कि संगीत शिक्षा की परम्परा को अखण्डित रखने के लिए आजकल गुरुगृह में रहने की
आवश्यकता और व्यवहार्यता नहीं है। कई प्रान्तों में सरकार के द्वारा गुरुकुल चलाए
जाते हैं, उनका सारा खर्चा सरकारद्वारा उठाया जाता है, तथा
रहने का और आहार व्यवस्था का भी सही प्रबन्ध किया जाता है। दुर्भाग्यवश अन्य
सरकारी संस्थानों की तरह ऐसे गुरुकुलों का व्यवस्थापन भी संशय के घेरों में होता
है।
अब इतना होने के बाद घरानेदार गायन-वादन की
समृद्ध परम्परा क्या आज सही मार्ग से जा रही है? रागदारी संगीत की पूर्वापार
सुन्दरता क्या आज भी टिकी है?
इस मुद्दे पर विचार करते समय आधुनिक
अर्थव्यवस्था का विचार प्रथम सामने आता है। यद्यपि विनाशुल्क संगीत सिखानेवाले
गुरुओं की आज कमी नहीं है, परंतु उनका यथोचित लाभ उठानेवाले शिष्यों की मनोधारणा में बदलाव जरूर आया
है। सबसे प्रथम ज्ञानी गुरुओं का अधिक से अधिक समय का सहवास पाने के लिए शिष्य को
अपने अन्य व्यवधानों को छोड़ देने की आवश्यकता होती है। आजकल की घड़ी में वह बहुत ही
कठिन है।
आधुनिक काल में संगीत का अभ्यासक गुरु के
मार्गदर्शन के साथ-साथ इंटरनेट का ढंग से उपयोग कर रहा है। कोरोना के कारण सामाजिक
कार्यक्रमों पर बहुत सारे निर्बंध आ जाने से ऑनलाइन महफिलों की नवकल्पना सामने आ गई।
अनेक प्रमाणित, सम्मानित तथा सुप्रसिद्ध कलाकारों ने अपना कलाप्रदर्शन फेसबुक लाइव तथा अन्य
माध्यमों के जरिए जारी रखा। परंतु श्रोताओं की प्रत्यक्ष उपस्थिती न होने के कारण
स्वयंस्फूर्ति का अभाव इसमे दिखाई दिया। ऑनलाइन उपस्थित
श्रोतागण “लाइक” और अन्य “स्माइली”ओं का उपयोग करके प्रतिवचन देते हैं,
अनुकूल-प्रतिकूल मत प्रदर्शित भी करते हैं। परंतु संगीत की अभिव्यक्ति पर इसका कोई
परिणाम होता ही नहीं। कलाकार का रटा-रटाया आविष्कार बिना किसी जान के प्रदर्शित
हो जाता है। बहुतबार फेसबुक ‘लाइव’ का अर्थ
भी कलाकार के ‘ज़िंदा’ होने का एक
प्रतीक केवल बन जाता है।
आजकल कई संस्थाओं द्वारा ऐसा संगीत प्रदर्शन
“ऑनलाइन पेमेंट” के जरिए प्रस्तुत हो रहा है, जिससे कलाकारों के अर्थार्जन का
मार्ग खुल गया है। यद्यपि इन महफिलों का प्रमाण कम है, कुछ
कार्य आरम्भ हो चुका है, यह सत्य है।
राग समय के बारे में कुछ
विचार
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में रागों के
“योग्य” समय पर गाने-बजाने के बारे में विशेष महत्व दिया गया है। इसके लिए दिन के
चार तथा रात्रि के चार प्रहर, यानि आठ प्रहर के राग नियमबद्ध समयसारिणी के
अनुसार समझाएँ गए हैं। इसके अलावा सन्धिप्रकाश रागों का भी विशेष वर्णन शास्त्रों
में किया गया है। संगीत के अभ्यासक इस नियमावली का कठोरता से पालन करते हैं, यह बहुतांश रूप से देखा जाता है। यह समयचक्र क्या है, तथा इसका वर्णन किस तरह किया गया है इसे देखना बहुत महत्वपूर्ण है। इसी
के साथ पूर्व राग और उत्तर राग क्या होते हैं, इसे भी देखना
जरूरी है।
आजकल यू ट्यूब,
व्हाट्सैप्प, फेसबुक जैसे लोकप्रिय समाज माध्यमों पर संगीत
सुननेवालों के ग्रुप्स बन गएँ हैं, तथा दिनभर अनगिनत रागों
के रेकार्डिंग्स एक-दूसरे को भेजे जाते हैं। ऐसी हालत में कोई समयानुसार रागों का
श्रवण करता हो यह असंभव है। ऐसी अपेक्षा करना भी गलत है। दुर्भाग्यवश आजकल के
हालात श्रोताओं के समक्ष संगीत कार्यक्रमों के न होने के हैं।
रागसमय के बंधन को ध्यान में रखते हुए अक्सर
कई खास सभाओं का आयोजन किया जाता है, जहाँ केवल सुबह के सत्र होते हैं। बड़े
नगरों में “दीपावली की प्रभात” होती है, जहाँ केवल भोर के
समय के राग सुनने को मिलते हैं। ऐसे भी आयोजन होते हैं, जहाँ
प्रभातसमय के संधिप्रकाश राग, सूरज के उगने के बाद गाए
जानेवाले, तथा मध्यान्ह के समय के राग सुनने को मिलते हैं।
शाम के सत्र में पूर्व सन्ध्या के समय के, शाम के संधिप्रकाश
राग, सूर्यास्त के बाद वाले, रात के
समयवाले तथा हो सके तो उत्तर रात्री के राग भी ऐसी सभाओं में श्रोताओं को सुनने को
मिलते हैं। परन्तु आजकल समय की पाबन्दी के चलते रागसमय चक्र को सभाओं में अनुभव
करना केवल नामुमकिन हो चुका है।
एक जमाना था, जब शाम को आरम्भ हुई
संगीतसभा सुबह तक चलती थी। रसिक श्रोतागण बड़े पैमाने पर इसमें शरीक हुआ करते थे।
रातभर सुने हुए गायन-वादन की मधुर स्मृतियाँ दूसरे दिन के अपने कार्यकलापों के साथ
अपनी स्मृति में जगाकर रात को फिर दूसरी सभा में उपस्थित हुआ करते थे। फिर पूरी
रात नए सुरों का मजा लेते लेते सुबह के सत्र में थकावट का नाम भी न लेते हुए बैठे
रहते थे। आजकल केवल गिनेचुने संस्थानों में रात-दिन चलनेवाली संगीतसभाएँ आयोजित
होती हैं, जैसे माणिकनगर का दरबार,
मिरज या कुंदगोल का उत्सव।
ऐसी सभाओं में घरन्दाज गायक-वादकों के बड़ी
संख्या में समाविष्ट होने के कारण जानकार
तथा गुणीजनों की उपस्थिती भी अधिक मात्रा में होती है। अप्रचलित तथा हर मेल के, आठों
प्रहरों के राग सुनाने का अवसर कलाकारों को भी मिल जाता है। कई बार फर्माइशें भी
पूरी हो जाने के कारण संगीत रसिक पूरी तरह तृप्त हो जाते हैं। रसिक श्रोताओं के
लिए ऐसी सभाएं तीर्थस्थल बन जाती है।
इस पूरी बात का मूल है समयाधारित रागगायन।
प्रातःकालीन रागों से आरम्भ करके आठों प्रहर के कुछ महत्वपूर्ण तथा लोकप्रिय रागों
के नाम तथा उनका छोटा विवरण देने की यहाँ कोशिश करेंगे।
शास्त्रीय संगीत सुननेवालों के लिए तथा
भारतीय संगीतशास्त्र को समझने की इच्छा रखानेवालों के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें
बताने का प्रयास यहाँ किया गया है।
हिंदुस्तानी रागों के
मुख्यत: तीन वर्ग हैं।
१ कोमल रे तथा कोमल ध वाले राग
२ शुद्ध रे तथा शुद्धा ध वाले राग
३ कोमल ग तथा कोमल नी वाले राग
पहले वर्ग के रागों को सन्धिप्रकाश के समय
गाया/बजाया जाता है।
प्रभात के संधिप्रकाश राग
|
क्र.१ २ ३ |
नाम भैरव
रामकली कालिंगड़ा
|
ठाट भैरव
भैरव भैरव
|
आवश्यक
जानकारी - शुद्ध म का प्रयोग सम्पूर्ण
राग, को. रे ध, जनक, आश्रय राग भैरव
अंग, तीव्र म तथा कोमल नी का प्रयोग रे
और ध पर आंदोलन नहीं होता |
सायंकालीन संधिप्रकाश राग
|
क्र १ २ ३ |
नाम पूर्वी
पूरिया
धनाश्री श्री
|
ठाट पूर्वी
पूर्वी
पूर्वी
|
आवश्यक
जानकारी – तीव्र म का प्रयोग दोनों
म का प्रयोग, जनक, आश्रय राग नि
रे ग से आरोह प्रारम्भ सा
रे म प नि आरोह |
हर नियम के अपवाद होते हैं। राग का
सौंदर्यशास्त्र अलग है, तथा ठाट के नियम अलग हैं। प्रभातकालीन संधिप्रकाश रागों में तोड़ी को भी
समाविष्ट किया जाता है, परंतु उसमें तीव्र म का प्रयोग होता
है। उसी तरह राग भटियार भी प्रात:कालीन माना जाता है, जो
मारवा ठाट का होने के कारण शुद्ध ध को महत्व देता है।
सायंकालीन संधिप्रकाश रागों में मारवा भी समाविष्ट है, परंतु उसमें
शुद्ध ध की बहुलता है। गौरी राग के भैरव तथा पूर्वी अंग के दोनों प्रकार हैं। इस
शृंखला में अनेक ऐसे राग हैं, परंतु यहांपर केवल प्रचलित
रागों के नाम दिए गएँ हैं।
शुद्ध रे ध वाले राग
संधिप्रकाश रागों के पश्चात शुद्ध रे ध के
प्रयोगवाले रागों का समय आरंभ होता है। इसमें भी सुबह तथा शाम के राग समाविष्ट
हैं। सुबह के समय इस श्रेणी में बिलावल, देसकार,
गौड़सारंग जैसे राग तथा शाम के समय कल्याण के प्रकार, भूपाली
जैसे राग सुनने को मिलते हैं।
कोमल ग नी वाले राग
शुद्ध रे ध वाले रागों के पश्चात कोमल ग नी
वाले रागों की बारी आ जाती है। इसमें भी दिन के तथा रात के समय के रागों को सुनने
का आनंद मिलता है। साधारण तौर पर सुबह के दस से चार बजे तक तथा रात के दस से उत्तर
रात्री के चार बजे तक इन रागों को सुनने को मिलता है। दिन में जौनपुरी, देसी तथा रात
में बागेश्री, बहार तथा कंस के प्रकार सुनने को मिलते
हैं।
उत्तर राग तथा पूर्व राग
समयाधारित रागविभाजन के तत्व में रात के
बारह से दिन के बारह तक तथा दिन के बारह से रात के बारह बजने तक के समय का विचार
रखा गया है। रात से शुरू होकर दिन तक के रागों का वादी स्वर म प, ध नी सां
इस सप्तक के उत्तरांग में होता है। उसी प्रकार दिन के बारह से शुरू होनेवाले रागों
का वादी स्वर सा रे ग म प इस सप्तक के पूर्वांग में होता है। इसी कारण इन रागों को
क्रमश: उत्तर राग या उत्तरांग वादी राग और पूर्व राग या पूर्वांग वादी राग कहा
जाता है।
Wednesday, April 30, 2025
श्री शिवरायांचा पोवाडा
श्री शिवरायांचा पोवाडा
रचना
नंदन हेर्लेकर
प्रथम वंदुया भारतमाता
आई भवानी तुळजेला
आणि गुरुजन वंदुन गातो
मर्दुमकीच्या कवनाला
जी जी रं जी जी रं जी जी रं जी.....
म्लेंच्छ शक्तिच्या आक्रमणाने फुटली छाती मर्दांची
लाचारीची, नैराश्याची कशी दुर्गती देशाची
कधी मोगली कधी फिरंगी अब्रू लुटती आर्यांची
बुडे धर्मही ध्वस्त मंदिरे गणति न अत्याचाराची
जी जी रं जी जी रं जी जी रं जी....
फडकला, फडकला, भगवा झेंडा फडकला
शिवनेरीच्या जरीपटक्याने अवघा देश चेतविला
पेटुन उठला मर्द मराठा, सह्याद्रीही सळसळला
छत्रपती शिवराजा हो ........
छत्रपती शिवराजा बनला नरसिंहाचा नव अवतार
मुजरा करुन गर्वाने गातो मर्दुमकीच्या कवनाला
जी जी रं जी जी रं जी जी रं जी....
धैर्य नवे देशास मिळाले धार मिळे तलवारीला
मर्दांची मनगटे जाहली बळकट देशसेवेला
शतकांचा अंधार नष्ट तो झाला उजळे सृष्टीला
शिवरायांच्या जयजयकारे स्फूर्ती मराठभूमीला
म्हणुनी आजही आम्ही गातो मर्दुमकीच्या कवनाला
जी जी रं जी जी रं जी जी रं जी.......
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