आज आचार्य अत्रे यांचा स्मृतिदिन. आजच्या मराठी वाचकाला (केवळ whatsapp सोडुन) केशवकुमार कोण आणि केशवसुत कोण हे ठाऊक जर असेल तर प्रश्नच उद्भवत नाही! केशवसुतांनी कवीचे श्रेष्ठत्व सांगण्यासाठी लिहिलेली अचाट प्रतिभेची कविता वाचून थोर साहित्यिक, पत्रकार, नाटककार, टीकाकार, कवी, शिक्षणशास्त्रज्ञ, राजकारणी, प्रभावी वक्ता आणि महान विनोदी लेखक, विडंबनकार प्रल्हाद केशव अर्थात आचार्य अत्रे यांनी लिहिलेली ही त्यावरील विडंबनकविता वाचून हंसून पोट दुखले नाही असं वाचक एकेकाळी एकही नसावा.
The purpose of this blog is to highlight some important points of ancient Indian Music through write ups and articles. There is a wide variety of musical thoughts, instruments and styles Here some old articles are re-written with new references. My published books are - The Beginners' Book On Hindustani Music (2 Editions), Tabla - Principles And Art, Naad Rang (Marathi) and Vaadye Nanapari (marathi). Exploring path is always enjoyable.
Saturday, June 13, 2026
केशवकुमार, अर्थात आचार्य अत्रे
Sunday, October 13, 2024
मात्रिक छंद आणि वर्णिक छंद.
Sunday, October 29, 2023
THAAT थाट
THAAT
थाट
Thaat is frame that Raga fits
into. This term is of recent origin. Earlier, there used to be
GRAAM-MEL-MOORCHHANA ग्राम मेल मूर्च्छना system.
The author of the 15th century “RAGA TARANGINI”, Lochan abolished
the
system and introduced Mel or
Thaat. Till the time of Lochan, there were 16 thousand Ragas among which 16
were popular. He introduced 12 Thaats, namely
1.
Bhairavi, 2. Todi, 3. Gouri, 4. Karnat, 5. Kedar, 6.
Eman, 7. Sarang, 8. Megh, 9 Dhanashri, 10. Poorvi, 11. Mukhari and 12 Deepak.
In
1665 Hriday Narayan Dev defined these Thaats and classified the Ragas
accordingly. In 17th century another musicologist Shrinivas
catagorised Ragas scientifically. He established that Ragas take birth from Thaats
and they are classified as Audav, Shadav and Samppoorna.
This
system went on well. The exception was the book RAGA VIBODH. There, the number
of Thaats was 23.
The
great Pandit Venkatmakhin proved mathematically that the number of Thaats as
72.
Pt.
Vishnu Narayan Bhatkhande (1860-1916) founded the theory of 10 Thaats and
classified all the known Ragas into them. Thus the history of Thaats begins
with Pt. Lochan and completes with Pt. V. N. Bhatkhande. His 10 Thaat theory
accepts and embraces all good factors from the 32 Thaats which were proven
earlier mathematically.
Pt.
Bhatkhande defined Thaat as
A
Thaat is cluster of Swaras from which the Ragas emerge. Naad, Swar, Saptak and
Mel is the order that makes a Thaat.
1. Thaat
chooses only seven Arohi Swars.
2. The
order is Sa Re Ga Ma Pa Dha Ni
3. The
Avaroha is not taken into account.
4. The
Swars taken are Shudh and Vikrut
5. Thaat
is never sung, so sweetness of Swars is not thought of.
6. The
name of the Thaat is chosen from the most popular Raga from it.
मेल:स्वरसंम्मूह:स्याद्रगव्यञ्जनशक्तिमान्
Pt.
Bhatkhande has defined Thaat in the above Shloka. The following lines show the
features of 10 Thaats.
1.
Kalyan Thaat सा रे ग मे प
ध नी (verticle
line above म)
All Shudh Swars, except Teevra Ma
2.
Bilawal Thaat सा रे ग म प ध नी
All Shudh Swars
3.
Khamaj Thaat सा रे ग म प ध नी
All Shudh Swars except Komal Ni
4. Bhairav Thaat सा रे ग म प ध नी
Komal Re and Dha
5.
Poorvi Thaat सा रे ग मे प ध नी (verticle line above म)
Komal Re Dha and Teevra Ma
6.
Marvah Thaat सा रे ग मे प ध नी (verticle
line above म)
Komal Re and Teevra ma
7.
Kafi Thaat सा रे ग म प ध नी
Komal Ga and Ni
8.
Asawari Thaat सा रे ग म प ध नी
Komal Ga Dha and Ni
9.
Todi Thaat सा रे ग मे प ध नी (verticle
line above म)
Re Ga and Dha Komal with Teevrta Ma
10. Bhairavi Thaat सा रे ग म प ध नी
All possible Komal Swars Re Ga Dha Ni
Saturday, October 28, 2023
DHWANI & SWAR
ध्वनि, नाद, श्रुति तथा स्वर
ध्वनि का अर्थ कोई भी आवाज. इसमें कोलाहल भी
गिना जा सकता है.
नाद सुमधुर होता है. संगीतोपयोगी ध्वनि यानि
नाद. यह कुछ क्षणों के लिए टिकता है.
श्रुति का अर्थ सूक्ष्मता से है.
अतिसूक्ष्म नाद श्रुति कहलाता है. एक सप्तक में ऐसे अनेक सूक्ष्म नाद होते हैं.
इनमें से बाईस नादों को चुन कर एक सप्तक में स्थान दिया गया है.
जिस श्रुति पर स्थिरता से रुका जाता है,
वह स्वर होता है. नाद की मधुरता, कुछ क्षणों के लिए ठहराव ये दोनों गुण इसमें होते
ही हैं, परन्तु इसमें निश्चित आन्दोलनसंख्या का विशेष गुण है. हर स्वर कि निश्चित श्रुति
होती है. इसे स्पष्ट करने के लिए यह श्लोक है-
चतुश्चतुश्चतुश्चैव षड्जमध्यमपञ्चमः
द्वेद्वे निषाद गान्धारौ त्रिस्त्रिऋषभधैवत:
नाद
१.
नाद छोटा या बड़ा होता है. छोटा नाद छोटे अंतर में सुनाई देता है तो
बड़ा नाद दूरतक सुनाई देता है. इसे अंग्रेजी में Magnitude कहा जाता है.
२.
नाद का निर्माण जिस चीज से होता है उससे नाद कि जाति निर्भर है.
गले से उत्पन्न नाद, सितार, तानपुरा या किसी भी वाद्य से निर्मित नाद से
उस नाद कि जाति समझी जाती है. इसे अंग्रेजी में Timbre कहा जाता है.
३.
नाद कि ऊंचाई-निचाई संगीत निर्माण में अति महत्त्व रखती है. नाद की प्रति सेकैंड आन्दोलन संख्या
उसकी ऊंचाई या निचाई स्पष्ट करती है. इसी का स्वरूप सा रे ग म आदी स्वरों से स्पष्ट
हो जाता है. अंग्रेजी में इसे Pitch
कहते हैं.
गानक्रिया या वर्ण
गायन-वादन में प्रत्यक्ष रूप से की जानेवाली कृति को गानक्रिया या
वर्ण कहा जाता है. ऐसे चार तरह के वर्ण होते हैं १. स्थायी, २. आरोही, ३ अवरोही तथा
४. संचारी.
१.
स्थायी वर्ण एक ही स्वर के बार बार उच्चारण से बनता है, जसे सा सा,
रे रे, ग ग ग, म म म आदी.
२.
आरोही वर्ण नाम से ही स्पष्ट है. सा से रे अथवा क्रम से लिया नी तक
गाया-बजाया हुआ स्वरसमूह आरोही है. जैसे सारे, सारेग, सारेगम, सारेगमप,
सारेगमपध, सारेगमपधनी ये सब आरोही वर्ण है.
३.
अवरोही वर्ण स्वरोंके अवरोही गाने-बजाने से स्पष्ट होते हैं.
सांनी, सांनीध, सांनीधप ...आदी.
४.
संचारी वर्ण आरोही-अवरोही वर्ण के मिश्रण से बनते हैं. जब ‘गरेगमगगरेसारे’
ऐसी स्वरपंक्ति गयी-बजाई जाएँ तो वह संचारी वर्ण कहलायेगा.
शुद्ध स्वर-विकृत स्वर
हिन्दुस्तानी संगीत में प्रारंभ में सिखाये जानेवाले स्वर शुद्ध स्वर
कहलाते हैं. यह बिलावल ठाट के स्वर होते हैं. लिखते समय इन स्वरों के कोई चिन्ह नहीं
दिए जाते.
विकृत स्वरों का अर्थ शुद्ध स्वरों से कम या ज्यादह श्रुति
संख्या से स्पष्ट होता है. शुद्ध स्वर से नीचे लगनेवाला स्वर कोमल होता है, तो शुद्ध
स्वर से ऊपर लगनेवाला स्वर तीव्र कहलाता है. एक सप्तक में कोमल स्वर चार होते हैं,
रे, ग, ध तथा नी. इन स्वरों के निचे आडी रेखा खींची जाती है, जैसे रे, ग,
ध और नी . तीव्र स्वर सप्तक में एक ही होता है और वह है म. इस स्वर के
ऊपर सीधी रेखा खींची जाती है.
अचल स्वर
सप्तक में सात स्वरों के साथ विकृत स्वरों को मिलाकर कुल बारह स्वर
होते हैं . रे ग ध तथा नी कोमल तथा म
तीव्र ऐसे यह स्वर हैं. यहाँ षड्ज और पंचम में कोई बदल नहीं होता. इन स्वरों
का विकृत स्वरूप नहीं होता. इसीलिए इन दो स्वरों को अचल स्वर कहा जाता है. सप्तक के
आधे भाग का आरंभ इन्हीं स्वरों से होता है. पूर्वार्ध सारेगम तथा उत्तरार्ध पधनीसां.
पंचम का स्थान षड्ज से डेढ़ गुना ऊँचा है. इसीलिए इनमें न परस्पर संवादित्व है. ‘षड्ज-पंचम’ भाव को संगीत
में अनन्यसाधारण महत्त्व है. तानपुरे के तारों को इन्हीं सुरों में मिलाया जाता है.
Sunday, April 16, 2023
How many Ragas can be created Mathematically in Hindustani Music?
गणित द्वारा एक
ठाट से अधिक से अधिक कितने रागों का निर्माण हो सकता है?
गणित के द्वारा
एक ठाट से अधिक से अधिक ४८४ रागों कि निर्मिति हो सकती है.
राग की तीन
प्रमुख जातियाँ होती हैं, जो सबको विदित है. ओड़व, षाडव तथा सम्पूर्ण. इनके मिश्रण
से आगे ९ जातियाँ हो जाती हैं, जो औडवऔडव, औडवषाडव, औडवसम्पूर्ण, षाडवऔडव, षाडवषाडव,
षाडवसम्पूर्ण, सम्पूर्णऔडव, सम्पूर्णषाडव तथा सम्पूर्णसम्पूर्ण कहलाती है.
ठाट से राग
निर्मिति की विधि को समझने के लिए अब बिलावल ठाट का उदाहरण लेंगे. इस ठाट के सब
स्वर शुद्ध होते हैं. सर्वप्रथम हम तीन मुख्य जातियों को देखेंगे.
१.
सम्पूर्ण जाति का केवल एक आरोह बन सकता है. इसका कारण स्पष्ट है, कि ठाट में सात
ही शुद्ध स्वर होते हैं. सम्पूर्ण जाति के रागों में सातों स्वरों का प्रयोग होता
है.
२.
षाडव जाति के आरोह में छह स्वरों का प्रयोग होता है. इसीलिए प्रत्येक राग के
आरोह में षड्ज छोड़ कर बारी बारी से एकएक स्वरों को छोड़ते जाना है. सा के अतिरिक्त
सप्तक में छह स्वर होते हैं, इसीलिए ऐसे छह आरोह बन जाएंगे. इसमें पहले रे, फिर ग,
फिर म इस तरह एकएक स्वर छोड़ा जा सकता है. जैसा आरोह वैसा ही अवरोह होगा.
३.
औडव जाति के आरोह में पांच स्वर होंगे. सप्तक में सात शुद्ध स्वर होते हैं,
इसीलिए औडव जाति के प्रत्येक राग में बारीबारी से दो दो स्वर छोड़ते जाएँगे. इन
स्वरों की पन्द्रह जोड़ियाँ हो जाती हैं, जैसे रेग, रेम, रेप, रेध, रेनी, गम, गप,
गध, गनी, मप, मध, मनी, पध, पनी, धनी. इस तरह औडव जाति के पंद्रह अवरोह बन जाएँगे.
प्रत्येक बार सप्तक से इन जोड़ियों को क्रमशः निकालते जाएँगे, तो फलस्वरूप पंद्रह रागों
की रचना होगी. उदाहरण पहले राग का आरोह सा .. म प ध नी सां, दूसरे का सा .. ग प ध
नी सां वगैरह. जो स्वर आरोह में होंगे वही अवरोह में होंगे.
यहाँ पर केवल तीन
जातिओं के रागों पर विचार हुआ. जब नौ जातिओंके रागों की निर्मिति पर विचार करेंगे
तो इस विधि से चलना होगा...
१.
सम्पूर्ण षाडव जाति के छह राग होंगे. प्रत्येक राग में आरोह एक ही होगा क्यों कि
प्रत्येक का आरोह सम्पूर्ण है, परन्तु अवरोह क्रमशः बदलते जाएँगे. यहाँ पर षाडव
जाति के छह अवरोह जो बनते हैं, उनको एकएक आरोह में क्रमशः जोड़ते जाना है.
२.
सम्पूर्ण औडव जाति के पंद्रह राग निर्माण हो जाते हैं. इन रागों में भी आरोह
नहीं बदलेगा. अवरोह क्रमशः बदलता जाएगा. औडव जाति के पंद्रह अवरोह जो निर्माण हो
सकते हैं, उन्हें क्रमशः जोड़ते जाने से ऐसे पंद्रह अवरोह निर्माण होंगे. उदाहरण के
लिए प्रथम अवरोह में रे ग वर्जित होंगे अर्थात अवरोह सां नी ध प म .. .. सा हो
जाएगा. इसी प्रकार दूसरे अवरोह में रे म स्वर वर्जित करके सां नी ध प .. ग .. सा
ऐसा हो जाएगा. बारीबारी से ऐसे पंद्रह अवरोहों से सम्पूर्ण आरोह जोड़ देने से
पंद्रह राग बन जाएँगे.
३.
षाडव षाडव जाति के छह गुना छह ऐसे छत्तीस राग बन जाते हैं. प्रत्येक राग में
बारी बारी से सा को लेने के बाद एक एक स्वर को छोड़ते जाएँगे. जैसा आरोह वैसा ही
अवरोह होगा. षाडव जाति के प्रथम आरोह को रे वर्जित करके क्रमशः छह अवरोहों से
जोड़ते जाएँगे. इस प्रकार इस प्रथम आरोह के मिश्रण से छह राग निर्माण हो जाते हैं.
अब दूसरे आरोह में ग वर्जित करने से बाकी सारे अवरोहों को जोड़ देने से और छह राग
निर्माण हो जाते हैं. इसी प्रकार तीसरे, चौथे, पाँचवे तथा छठवे स्वर को छोड़ कर
आरोह बनाने से तथा बाकी छह अवरोहों से मिलाने से प्रत्येक मिलाफ से छह गुना छह
अर्थात छत्तीस राग निर्माण हो जाते हैं.
४.
षाडव औडव जाति के इसी गणित के आधार पर छह गुना पंद्रह अर्थात नब्बे राग
निर्माण हो जाते हैं. इनमें भी बारी बारी से प्रत्येक आरोह को अवरोहों से मिलाना
होता है. षाडव जाति के छह आरोह और औडव जाति के पंद्रह आरोह हो जाते हैं. प्रत्येक
आरोह को पंद्रह अवरोहों से जोड़ देने से अलग अलग रागों का निर्माण हो जाता है. नीचे
यह सारिणी देखने पर रूप स्पष्ट हो जाएगा.
षाडव जाति के आरोह
औडव जाति के अवरोह
१.
सा ग म प ध नी नी ध प
म ग .. सा
२.
सा ग म प ध नी नी ध प
.. ग .. सा
३.
सा ग म प ध नी नी ध ..
म ग ..सा
४.
सा ग म प ध नी नी ..प
म ग .. सा
५.
सा ग म प ध नी नी .. प .. म रे सा
६.
सा ग म प ध नी नी ध प
.. .. रे सा
७.
सा ग म प ध नी नी ध ..
म .. रे सा
८.
सा ग म प ध नी नी ध .. म ग .. सा
९.
सा ग म प ध नी .. ध प
म .. रे सा
१०.
सा ग म प ध नी नी ध ..
.. ग रे सा
११.
सा ग म प ध नी नी .. प
.. ग रे सा
१२.
सा ग म प ध नी .. ध प
.. ग रे सा
१३.
सा ग म प ध नी नी ..
.. म ग रे सा
१४.
सा ग म प ध नी .. ध ..
म ग रे सा
१५.
सा ग म प ध नी .. ..
प म ग रे सा
यहाँ पर सारे रूप स्पष्ट हो जाते हैं. अब आरोह के क्रम में षाडव का
दूसरा आरोह, जिसमें ग वर्जित है, उसे लेकर सारे पंद्रह अवरोहों से क्रमशः जोड़ेंगे
तो षाडव औडव जाति के अन्य पंद्रह राग निर्माण हो जाते हैं. इसी तरह क्रमशः एकएक
स्वर छोड़ देने से तथा औडव के पंद्रह अवरोहों से जोड़ने से प्रत्येक बार पंद्रह
रागों कि निर्मिति हो जाएगी. कुल ऐसे नब्बे राग बन जाते हैं.
५.
षाडव सम्पूर्ण जाति के छह राग बन जाते हैं. छह प्रकार के आरोह बन जाते हैं,
परन्तु अवरोह वही रह जाता है.
६.
औडव सम्पूर्ण जाति के पंद्रह रागों की रचना हो जाती है. इसमें हरेक में आरोह
बदलता रहता है, अवरोह नहीं बदलता. औडव जाति के पंद्रह राग बनते हैं, इसीलिए औडव
सम्पूर्ण जाति के पंद्रह राग बन जाते हैं.
७.
औडव षाडव जाति के पंद्रह गुना छह यानि नब्बे रागों की रचना हो जाती है. औडव
जाति के पंद्रह आरोह तथा षाडव जाति के छह अवरोह बनते हैं. इन्हीं के मिलाफ से उसी
विधि के अनुसार नब्बे रागों की निर्मिति हो जाती है.
८.
औडव औडव जाति के पंद्रह गुना पंद्रह यानि दो सौ पच्चीस राग बन जाते हैं.
अभी तक की गयी विधि के अनुसार यह रचना हो जाती है.
इसी प्रकार कुल मिलाकर निचे दिए गए
तक्ते के अनुसार रागों की संख्या देख सकते हैं
१.
सम्पूर्ण सम्पूर्ण १
२.
सम्पूर्ण षाडव ६
३.
सम्पूर्ण औडव १५
४.
षाडव सम्पूर्ण ६
५.
षाडव षाडव ३६
६.
षाडव औडव ९०
७.
औडव सम्पूर्ण १५
८.
औडव षाडव ९०
९.
औडव औडव २२५
कुल मिलाकर रागों
की संख्या ४८४ बन जाती है.
गणित के द्वारा
एक ठाट से अधिक से अधिक ४८४ राग निर्माण हो जाते हैं. अगर दस ठाट का हिसाब लगाया
जाएँ तो ४८४० यह संख्या हो जाती है. राग की व्याख्या पर अगर ध्यान दिया जाएँ तो
इतनी संख्या के सभी राग गाएँ जाना संभव नहीं है. ‘’रंजयते इति राग:’’ इस वाक्य पर
ध्यान दिया जाएँ तो इस कसौटी पर यह संख्या उतर सकती है क्या? उत्तर ‘’नहीं’’ आएगा.
यह बात भी ध्यान में लानी चाहिए की वादी संवादी बदल देने से भी राग बदल जाते हैं.
तब रागों की संख्या बढ़ सकती है. ऐसे होने पर भी प्रचार में अधिक से अधिक दो सौ राग
हो सकते हैं, इससे अधिक नहीं.