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Wednesday, August 12, 2020

आचार्य पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे

स्थाई 
चतुर पण्डित तेरो नाम अति पावन 
धन्य हो त गुनि सुजान 
भरन जात सुर निधान। 
अंतरा 
वाग्गेयकार महा 
विष्णु नारायण गुरु 
देवन को वंदन 
नन्दन करत है अज्ञान।।
पण्डित विष्णु नारायण भात खंडे जी का 10 अगस्त पर जन्मदिवस मनाया जाता है। हिन्दुस्तानी संगीत के महा पण्डित, शास्त्र कार, घोर कष्ट के उपरान्त किया हुआ प्रचण्ड ग्रंथ निर्माणकर्ता, बी ए, एल एल बी की पदवी के बाद वकालत की, परन्तु संगीत शास्त्र की उस समय की विपरीत अवस्था को देख कर वकालत छोड़ कर पूरे देश में भ्रमण करके महा पण्डित और उस्तादों के घरों में जा कर हजारों बंदिशों का संग्रह किया, आम जनता के लिए उन्हें वितरित किया। 1860 से 1936 तक के जीवनकाल में "न भूतो न भविष्य ति" कार्य किया। देश तथा देशप्रेम से प्रेरित होकर सारा साहित्य निर्माण संस्कृत और मराठी में प्रकाशित किया।वे कहते थे, अगर किसी अंग्रेज को शास्त्र सीखना हो तो उसे हमारी भाषा में ही भारतीय संगीत शास्त्र सीखना होगा। उसके लिए हमें अंग्रेजी में लिखने की कोई आवश्यकता नहीं। पंडितजी के सम्मान में एक बंदिश कि रचना की है, उन्हीं के चरणों में समर्पित करता हूं।

Monday, July 27, 2020

INDIAN MUSIC FROM 17th CENTURY - A GLIMPSE

  औरंगजेब के दरबार में संगीत को आश्रय उसके उत्तरकाल में नहीं के बराबर था, किन्तु उसके शासन के पूर्वकाल में उसके दरबारी फकिरुल्ला ने राजा मानसिंह तोमर के लिखे ‘मानकुतुहुल’ इस ग्रन्थ का ‘रागतरंग’ इस नाम से फारसी अनुवाद किया था। उसने अनेक विद्वानों को भी सम्मानित किया था। इसी काल में पण्डित अहोबल का ‘संगीत पारिजात’, पण्डित लोचन का ‘राग तरंगिणी’, पण्डित हृदय नारायण देव का ‘हृदय कौतुक’ तथा ‘हृदय प्रकाश’ ऐसे नाना ग्रन्थ लिखे गएँ। दक्षिण भारत में पण्डित वेंकटमखी ने ‘चतुर्दण्डी प्रकाशिका’ इस अनमोल ग्रन्थ की रचना की। उसमें दक्षिणी संगीत में प्रचलित ७२ मेलकर्ताओं का सर्वप्रथम उल्लेख आता है। आखिरी मुग़ल बादशाह का नाम संगीत जगत में ‘मोहम्मद शाह रंगीले’ इस उपनाम से प्रसिद्ध है। वह स्वयं उत्तम रचनाकार तथा संगीततज्ञ था। ख़्याल संगीत के जनक सदारंग, अदारंग उसी के दरबार में मौजूद थे। इसी समय शोरी मियाँ की टप्पा गायकी का आविष्कार भी हुआ था। 

आज जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत गाया-बजाया जाता है, उसका मूल स्रोत इसी समय से मिलता है। जौनपुर के नवाब शाह हुसैन शर्क़ी को आधुनिक ख्याल का जनक माना जाता है। उसके राजाश्रय के कारण ख़्याल का प्रसार हुआ। बंगाल प्रांत में चैतन्य महाप्रभु तथा अन्य संतों के कारण भक्तिसंगीत तथा अध्यात्म को बढ़ावा मिला। मराठा काल में शास्त्रीय संगीत में अधिक वृद्धि या योगदान मिलने के आसार नहीं थे, किन्तु पूर्वकाल में यादव काल में जन्मे सन्त ज्ञानेश्वर से लेकर सन्त नामदेव, जनाबाई, एकनाथ, तुकाराम, स्वामी रामदास आदि अनेकों के द्वारा रचित अभंग, ओवी, भजन, कीर्तन, भारुड, गौलन आदि अनेक काव्यप्रकारों ने संगीत और साहित्य समृद्ध किया। राजा शिवाजी के काल में उत्तर भारतीय कवि भूषण की रचनाएँ बहुत प्रसिद्ध हुई। मराठा शासन के उत्तर काल में शृंगार तथा भक्तिप्रधान लावणी ने सारे हिंदुस्तान के जनमानस पर जादू डाला। अंग्रेजों के शासन काल में सारे भारत में संगीत को स्थानिक शासकों द्वारा मिलता हुआ आश्रय कम होता गया। उनके आर्थिक और राजकीय व्यवहारों पर अंगरेजों का नियंत्रण होने लगा। इसका प्रमुख उदाहरण है ग्वालियर का। ग्वालियर का शासन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विकास में अति महत्व का स्थान रखता है। स्वामी हरिदास, तानसेन, बैजु तथा अनेक महानुभावों का कार्यक्षेत्र रहा ग्वालियर, राजा मानसिंह तोमर के कारण तथा आगे चल कर सिंदीया घराने के कारण संगीत के उत्थान के लिए मशहूर था। 

आज प्रचलित ख्याल परम्परा के जन्मदाता हददु-हस्सू खाँ, रहमत खाँ, निसार हुसैन खाँ, बड़े मोहम्मद खाँ आदि श्रेष्ठ आद्य गुरुओं के पश्चात विष्णुपन्त छत्रे, बालकृष्ण बुवा, वासुदेव बुवा तथा विष्णु दिगंबर पलूसकर जैसे अनेक क्रान्तिकारी कलाकारों ने इस नगरी को घरन्दाज संगीत का मायका बनाया। इसी नगरी में पण्डितों का घराना भी अग्रसर रहा। शंकर पंडित, एकनाथ पंडित, कृष्णराव पण्डित, तथा आज भी इस घराने के एल. के. पण्डित तथा उनका परिवार इस नगरी की धरोहर का रक्षण कर रहा है। ग्वालियर जैसी अन्य रियासतें भी संगीत के रक्षण के लिए कार्यरत रही। उनमें प्रमुखता से बड़ौदा, रामपुर, मेंहरगढ़, जयपुर, मेवाड़, तलवंडी, अवध, लखनऊ, जौनपुर, पटियाला, नेपाल, इन्दौर, तथा बंगाल और उत्तरी पूर्व के अहोम रियासतें संगीत तथा संगीतकारों के आश्रय के लिए प्रसिद्ध रहीं। 

अंगरेजों ने हिन्दुस्तानी या कर्नाटकी संगीत के लिए विकास की दिशा में कुछ नहीं किया, परन्तु अनेक अंगरेजी अधिकारियों तथा व्यक्तियों ने यहाँ के संगीत का व्यक्तिगत रूप से अभ्यास किया। उनमें प्रमुख नाम सामने आते हैं वह इस प्रकार हैं – कैप्टन विलियर्ड, कैप्टन एन. अगस्टस, जे. डी. पैटर्सन, फ्रांसिस ग्लाडविन, फ्रांसिस फ़ोक, औसले, विलियम स्टाइफोर्ड, जे. नाथन, कर्नल पी. टी. फ्रेंच, ए. कैम्पबेल, जॉन डेवी, क्राफ़र्ड, बर्डवूड, बोसङ्क्वेट, कार्ल एंजल, डब्लू. हंटर, ए. सी. बर्नेल,फॉक्स स्ट्रैंगवेज़  ऐसे कई नाम हैं। इन सब का ज्यादहतर लेखन शास्त्र पक्ष में है। अंग्रेजों के काल में जयपुर के राजा प्रतापसिंह ने कलावंतों की सहायता से ‘’संगीत सार’’ इस ग्रन्थ की रचना की। महम्मद रज़ा ने ‘’नगमात-ऐ-आसफ़ी’’ लिखा। कृष्णनन्द व्यास ने ‘’संगीत रागकल्पद्रुम’’, तो कोलकोता के राजा सुरीन्द्र मोहन टागोर ने ‘’यूनिवर्सल हिस्टरी ऑफ म्यूज़िक’’, म्यूज़िक फ़्रोम वेरियस औथोर्स’’, ‘’हिन्दू म्यूज़िक’’ तथा संगीत को समर्पित बहुत सारा लेखन किया।

 बीसवी सदी के पूर्व काल में महाराष्ट्र में संगीत नाटकों के द्वारा क्रांतिका रक कदम उठाएँ गएँ। ख्याल, टप्पा, तराना, कजरी, ठुमरी, होरी आदि उत्तर भारतीय गायनप्रकार मराठी नाटकों में सजने लगे। पण्डित भास्करबुवा बखले, पण्डित गोविन्दराव पटवर्धन, पण्डित रामकृष्णबुवा वझे, पण्डित विनायकराव पटवर्धन, मास्टर कृष्णराव जैसे घरन्दाज गायन में माहिर कलाकारों ने पारम्परिक नाट्यसंगीत का ढांचा ही बदल दिया।पहले मराठी नाट्यसंगीत नारदीय कीर्तन के अनुरूप था। आर्या, ओवी, साकी, दिण्डी तथा अन्य पारम्परिक धुनों पर मंचीय गायन हुआ करता था। बालगन्धर्व, मास्टर दीनानाथ, पटवर्धनबुवा, सवाई गन्धर्व जैसे गायक-अभिनेताओं ने तथा हिराबाई बड़ौदेकर, ज्योत्स्ना मोहिले, ज्योत्स्ना भोले आदि अनेक गायिकाओं ने मंचीय संगीत को ऐसा शास्त्रीय रूप दिया कि इन गीतों को शास्त्रीय गायन के मंच पर भी उच्च स्थान मिल गया। इसी आकर्षण से उत्तर से दक्षिण में आए तबला नवाज़ उस्ताद अहमदजान थिरकवा साहब ने नाट्यसंगीत को अपने अनोखे वादन से चार चाँद लगाएँ। उस्ताद अब्दुल करीम खाँसाहब भी इसके आकर्षण से वंचित न हो सके। उनकी महफिलों में मराठी नाट्यगीतों का गायन श्रोताओं के एक आकर्षण की बात बन गई। इसी कालखण्ड में हिंदुस्तानी शास्त्रीय क्षेत्र में घटी अभूतपूर्व घटनाओं ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्रान्ति को अंजाम दिया।

 १९०१ में लाहौर में विष्णु दिगंबर पलूसकर जी ने गान्धर्व महाविद्यालय की स्थापना की, जिसके कारण शास्त्रीय संगीत के द्वार आम जनता के लिए खुल गएँ। राजदरबारों तथा अमीर उमराओं की दहलीज पर अटकी संगीतकला अब स्वतन्त्र हो गईं। सारी बन्दिशों को विष्णु दिगंबर जी ने अपनी स्वयं की खोजी हुई स्वरलिपि में छपवाया। अनेक नगरों में अब संगीत की पाठशालाएँ खुलने लगी। ग्वालियर में भी १९१४ में शंकर गन्धर्व संगीत विद्यालय खुल गया। मुंबई, पुणे, दिल्ली, कोलकाता जैसे शहरों में आम जनता के लिए जलसे आयोजित होने लगे। संगीत कार्यक्रमों का आयोजन करनेवाली संस्थाओं का भी निर्माण होने लगा। 

 दूसरी ओर पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने पारम्पारिक बन्दिशें, ख्याल, तराने, ध्रुपद, धमार आदि छपवाकर उनको छह खंडों में संग्रह प्रसिद्ध किया। जिन बन्दिशों को पण्डित या उस्ताद सबके सामने गाने को मना करते थे, या गाएँ तो भी उनको विकृत स्वरूप में गाते थे, वह सारी चीजें सही स्वरलिपि में प्रकट हो गईं। यह भी एक अभूतपूर्व कार्य था। भातखण्डे जी के बाद अनेक विद्वानों ने ऐसे ग्रन्थों को प्रसिद्ध करना प्रारम्भ किया। ऐसे ग्रन्थकारों में प्रो. बी. आर. देवधर, पण्डित श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर, लक्ष्मीनारायण गर्ग, प्रभुलाल गर्ग, पण्डित शंकरराव व्यास, पण्डित राजाभय्या पूंछवाले, पण्डित रामकृष्णबुवा वझे, पण्डित विनायकराव पटवर्धन, पण्डित रविशंकर जैसे अनेक विद्वान हैं। इसी प्रकार संगीत विषय पर पत्रिकाएँ भी प्रकाशित होने लगी, जिनमें हाथरस का ‘’संगीत’’, गान्धर्व महाविद्यालय का ‘’संगीत कला विहार’’ जैसे अनेक प्रकाशन संगीतकारों तथा रसिकों के लिए अत्यन्त उपयुक्त साबित हुएँ। डा. अशोक रानडे, आचार्य बृहस्पति, पण्डित रामाश्रय झा, हरिश्चंद्र श्रीवास्तव, डा. गीता बैनर्जी, पण्डित निखिल घोष, डा. चैतन्य देव, फिरोज फ्रामजी तथा अनेक महानुभावों ने अपने संगीतविचार तथा संगीत से जुड़े विषयों पर ग्रन्थ रचनाएँ की है। आज के समय में अ. भा. गान्धर्व महाविद्यालय मण्डल, खैरागढ़ का विश्वविद्यालय, भारत गायन समाज, प्रयाग संगीत समिति, आदि देशव्यापी संगीत संस्थाओं के अलावा हर प्रान्त की सरकारें अभ्यासक्रम में संगीत का अन्तर्भाव कर रही हैं। देश के अनेक महाविद्यालयों में संगीत विषय लेकर स्नातक तथा स्नातकोत्तर शिक्षा का प्रावधान है।

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Thursday, July 23, 2020

पुराण काल से सोलहवी सदी तक

      महाभारत काल में संगीत की अधिक उन्नति हो गई। राजा महाराजाओं की प्रशंसा गाथा संगीत इस प्रकार में आती थी। समाज के सारे घटक संगीत की शिक्षा लेते थे। नट, नर्तक, गायक, वादक, सूत, मगध, कथावाचक ऐसे कलाकारों के विभाग थे। श्रीकृष्ण की बांसुरी, अर्जुन का बृहन्नला के रूप में नृत्य ये उस समय के उच्च संगीत के उदाहरण है। सारेगम आदि सप्तस्वर, ग्राम, मूर्च्छना, स्वरस्थान, लय आदि शब्दों के प्रमाण महाभारत में मिलते हैं।

उसी प्रकार पुराण ग्रंथों में भी संगीत के अनेक सन्दर्भ हैं। वायुपुराण में सप्तस्वर, इक्कीस मूर्च्छनाएं, तीन ग्राम, उनचास तान के प्रकार आदि का उल्लेख है। उसी तरह मार्कण्डेय पुराण में भी गायन, वादन तथा नर्तन का विवेचन है।

उपनिषदों में ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत के व्याकरण नियमों का उल्लेख है। बृहदा ख्योपनिषद में स्वरों के उच्चारण तथा उदात्त-अनुदात्त-स्वरित का भी वर्णन है।

भारतीय इतिहास के हर काल की ग्रंथ रचना में संगीत का वर्णन मिलता है तथा हर जमाने के संगीत की स्थिति पर उनसे प्रकाश डाला गया है। प्रतिशाख्य ग्रंथ में सप्तस्वरों के नाम कृष्ट, प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, मन्द्र तथा अतिस्वार्य ऐसे दिए गए हैं। (ध्यान रहें की उस जमाने में स्वर अवरोही स्वरूप से दर्शाए जाते थे।) उसमें मन्द्र, मध्य तार स्थान तथा विलंबित, मध्य द्रुत लय की जानकारी भी दी गई है।

शिक्षा ग्रन्थों में संगीत का शास्त्र के रूप में हुआ विकास दिखाई देता है। षडज, ऋषभ, गांधार, माध्यम, पंचम, धैवत, निषाद यह स्वरनाम, स्वरों की विविध पशु-पक्षियों की ध्वनि से तुलना जैसे विषय उनमें हैं। इन ग्रन्थों में याज्ञवल्क्य, नारदीय, मांडूक्य, अमरेषि तथा पाणिनीय शिक्षा का अंतर्भाव है। पाणिनी की अष्टाध्यायी को इनमें अत्यधिक महत्व है।

इसके उपरांत जैनकालीन ग्रन्थों में संगीत समाज के हर स्तर तक पहुँच गया हुआ दिखाई देता है। मार्गी संगीत नयी व्यवस्था में पिछाड़ी को गया और देसी संगीत की लोकप्रियता के कारण हर वर्ग के लोग अपने दैनंदिन व्यवहार में संगीत का प्रयोग करने लगे। नित्य पूजापाठ में गायन का प्रवेश हुआ। अनेक देसी रागों का निर्माण हुआ। तत, वितत, घन, सुषिर वाद्यों का प्रचार तथा प्रसार हुआ। दसवे शतमान में मुनि पार्श्वदेव संगीतशास्त्र के महान प्रणेता के रूप में उभर कर आएँ। संगीतोपनिषद’, संगीतसमयसार ऐसे ग्रन्थों का निर्माण हुआ। राग वर्गिकरण, रागांग, उपांग, भाषांग, क्रियांग, नृत्यशास्त्र पर भी विशेष लेखन हुआ। षटपुरुष रागों में श्री, भैरव, बसन्त, पंचम, मेघ तथा नट्नारायण इन रागों के नाम इन ग्रन्थों में दिए गएँ हैं।

जैन काल संगीत के लिए सुवर्णकाल माना गया है।

इसके पश्चात बौद्ध काल में भी संगीत चरमसीमा पर पहुँच गया। बौद्ध धर्म प्रचारक गायन, वादन, नर्तन तथा अभिनय के साथ प्रचार करते थे। भगवान गौतम बुद्ध ने आत्मसंयम की तुलना सूक्ष्मता के साथ जुड़ी हुई वीणा से की थी। उस समय तक्षशीला, वाराणसी, नालन्दा, विक्रमशिला, तदंतपुरी आदि शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे, तथा वहाँ संगीत का शास्त्र भी सिखाया जाता था। गुप्तील जातक ग्रंथ में कलाकार, विविध वाद्य, गुरु परम्परा, नर्तन आदि अनेक विषयों का वर्णन मिलता है। जातक’, पितक’, दिव्यवदान इन ग्रन्थों में उस समय के संगीत का वर्णन है। राजाओं के हाथों से कलावंतों को सम्मान मिलता था।

इस समय पाँच वर्गों में वाद्यों का वर्गिकरण किया गया था, जैसे आतत, वितत, आतत-वितत, घन तथा सुषिर। आतत वाद्य केवल एक तरफ से चमड़े से मढ़े हुए, दोनों तरफ से मढ़े हुए वितत, आतत-वितत में वीणा जैसे वाद्य, घन और सुषिर जैसे नाम आज होते हैं, वैसे ही थे। किन्नर जाती के लोग इन वाद्यों को बजाने में माहिर थे। मृद-अंग इस वर्णन के सार्थ मृदंग यह वाद्य मिट्टी से ही बनाया जाता था। वाद्यवृन्दों का आयोजन बहुत ही लोकप्रिय था। आज भी प्राचीन साँची, नालन्दा, मथुरा में मिले स्तूपों पर वाद्यवृन्दों के शिल्प देखने को मिलते हैं। अजंता तथा एलोरा के शिल्प भी उस जमाने के वृन्दों को दिखाते हैं।

भरत मुनि का काल चौथे शतमान का है। भरतमुनी के नाट्यशास्त्र में संगीत पर जो साहित्य मिलता है, उसी पर आज के संगीतशास्त्र की नींव रखी गई है। नाट्य, नृत्य, गायन, वादन, नाट्य के लिए वस्तु की रचना, वाद्यों के प्रकार, उनका वर्गिकरण आदि अनेक विषयों पर इस ग्रन्थ में विवेचन है। भरतमुनि ने ताल के दशप्राण की जानकारी दे कर पाँच जातियों की तथा मार्गी-देसी तालों की भी पुष्टि की है। वीणावादक की निपुणता तथा उसके सूक्ष्म अभ्यास से ही श्रुतियों का ज्ञान होना सम्भव होने का विचार उन्होने रखा है। वृन्द वादन के नियम भी बताएं हैं। वीणावादन तत्वज्ञ: श्रुतिर्जाति विशारद: ऐसा उनका वचन भी प्रसिद्ध है। भरत का शास्त्रमत आगे चल कर सर्वतोपरी रहा। वादी-संवादी-अनुवादि-विवादी इन स्वरों की जानकारी भरतकाल से ही सर्वविदित हुई। शुद्ध-विकृत स्वर, अलंकार, आदि का महत्व भी विदित हुआ। नृत्य का शास्त्रीय विवेचन, उसके लिए उचित सामग्री, वेषभूषा, मंच, आसन व्यवस्था, वाद्य, वादक तथा शिक्षक का स्थान इन विषयों पर भी इस अध्याय में चर्चा है।

इसके उपरान्त मौर्यकाल में साहित्य तथा संगीत का विशेष रूप से अध्ययन/लेखन हुआ। कालिदास, भास आदि कवियों का वह काल था। चन्द्रगुप्त के समय सेल्यूकस के कारण यूनानी संगीत से अपना देश परिचित हुआ। सेल्यूकस की बेटी एथेना यूनानी संगीत में प्रवीण थी। भारतीय तथा यूनानी संगीत में आदान प्रदान तभी से ही शुरू हुआ। सम्राट अशोक के काल में संगीत शृंगार को छोड़ कर भक्तिप्रधान बना। उसके पश्चात समुद्रगुप्त के काल से शक, हूण, कुषाण आदि संस्कृतिओं के मिलाफ़ के कारण भारतीय कलाविष्कार को  नए आयाम मिले।

इस समय तक संगीत का प्रचार तथा परिचय जनसामान्यों तक हो चुका था। छठवी शताब्दी तक शास्त्रविभाग में भी काफी लेखन हो चुका था। मतंग का बृहददेशी यह ग्रन्थ इसी काल का है। ग्राम राग इस संगति का प्रथम प्रयोग मतंगमुनी ने ही किया है। इस ग्रन्थ के अन्तर्गत स्वराध्याय, रागाध्याय तथा प्रबन्धाध्याय प्रकरण मुख्य हैं। अलंकार, स्वर, श्रुति, चतु: सारणा, मूर्च्छना, ग्राम, आदि चीजों का उपयोग संगीत के अन्दर उस समय में हो रहा था। ग्रामराग और देसीराग ऐसा विभाजन प्रचलित हो गया था। शुद्धा, भिन्ना, गौड़ी, वेसरा, साधारणी जैसी पाँच गीतियों को भी उपयोग में लाया जाता था। रागों के अन्तर्गत शुद्ध, भाषांग, क्रियांग, रागांग तथा उपांग भेद माने जाते थे। मतंग के काल में रागों की व्यवस्था में पूरा स्वरूप स्पष्ट हो चुका था। उसके समय तक स्वतन्त्र रूप से गायन करने की पद्धति को अपनाया गया था। उसी के अन्तर्गत प्रबन्ध गायन का प्रकार रूढ हो गया था। (इससे ये तात्पर्य है कि उस समय तक समूहिक पठन को ही महत्व था। सामगायन से ही गायन कला का अर्थ सीमित था।)

सातवी सदी में हर्षवर्धन के काल में संगीत चरमसीमा पर था। राजा स्वयं कवि, लेखक तथा संगीत पारंगत था। गायन और नृत्य में भी उसका ज्ञान अच्छा था। ‘’हर्षावली’’ यह उसी का लिखा हुआ नाटक उच्च कोटी का लेखन प्रयोग है। उसके दरबार में कलाकारों का सम्मान किया जाता था। बाणभट्ट यह प्रसिद्ध कवि उसी के आश्रय में था। मतंग का बृहद्देशी यह ग्रन्थ इसी काल की देन है।

हर्षवर्धन के राज्यकाल के बाद भारत की अखण्डता नष्ट हो गई। संगीतकारों का जीवन संकुचित बन गया। कला की अवनति का समय शुरू हो गया। आपस में ज्ञान की लेन-देन की भावना नष्ट होने लगी। परंतु अपने-अपने प्रदेशों में प्रादेशिक संगीत को बढ़ावा मिलता रहा। इस समय का राजपूताना संगीत प्रसिद्ध हुआ। कल्हण का राजतरंगिणी यह ग्रन्थ इसी काल में लिखा गया है।

भवभूति के महावीर चरित’, मालती-माधव’, जयदेव का गीतगोविंद तथा अन्य अनेक नाट्य, संगीत तथा चिकित्साग्रंथ इसी काल में लिखे गएँ।

इस कालखण्ड के पश्चात भारत में मुसलमानों का आक्रमणकाल प्रारम्भ हुआ। संगीत के लिए यह काल परिवर्तन का सिद्ध हुआ। ईरान के दरबार में हिंदुस्तानी संगीतकारों को आमंत्रित किया जाने लगा। ईरानी संगीत का प्रभाव भारत में दिखाई देने का प्रारम्भ इसी काल से हुआ। भारतीय संगीत की आध्यात्मिक नींव बदल कर उसमें विलासीनता का उद्भव होने लगा। इसी काल से हिंदुस्तानी और दक्षिणाधी संगीत का भेद दृष्टिगोचर होने लगा।

बारहवी सदी में अल्लाउद्दीन खिलजी के समय से उत्तर भारत का संगीत नयी शैली में परिवर्तित होने लगा। नए गायनप्रकार, नए ताल तथा नएँ वाद्य प्रचार में आ गएँ। कव्वाली का उदय हुआ। सरपरदा, साजगिरी, ईमन जैसे अनेक नएँ राग संगीतजगत में आ गएँ। भारतीय वीणा का आधार लेकर ‘’सेहतार’’ इस वाद्य का आविष्कार किया गया, तथा अन्य ईरानी तंतुवाद्यों को भारत में प्रचलित किया गया। देवगिरि के दरबार से तत्कालीन विद्वान गोपाल नायक को दिल्ली लाया गया तथा उनसे अमीर खुसरो ने भारतीय रागों का परिचय पा कर उनके नएँ रूप विकसित किए।

तेरहवि सदी में शार्ङ्ग्देव का संगीत रत्नाकर यह अति महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा गया। इसमें संगीत के सारे प्रकार, वाद्य, नाट्य, साहित्य आदि विविध विषयों की विस्तृत जानकारी है। ध्वनि, नाद, श्रुति, स्वर, सप्तक, आरोह-अवरोह, वर्ण, अलंकार आदि के अलावा स्वरों के विविध रंग, उनकी पशु-पक्षियों के नाद के साथ समानता, ग्राम, मूर्च्छना, विविधा जातियाँ तथा लक्षणों की भी प्रस्तुति दी गई है। तानों के विभिन्न प्रकार वर्णित करते हुए शार्ङ्ग्देव ने प्रस्तार, खंडमेरु के बारे में भी बताया है। उसने तीस ग्रामराग, आठ उपराग, बीस राग तथा भाषा, विभाषा, अंतरभाषा, रागांग, भाषांग, उपांग, क्रियांग ऐसे सारे प्रचलित गायनप्रकारों की जानकारी दी है।

शार्ङ्ग्देव ने अपने समय के संस्कृत, प्राकृत तथा देसी प्रबन्ध तथा उन  के प्रकार यानि सूड प्रबन्ध, आलि प्रबन्ध, विप्रकीर्ण प्रबन्धों का भी वर्णन किया है। इसके अलावा ध्रुव प्रबन्ध भी प्रचलित थे, जिसका परिवर्तन ध्रुवपद में हुआ ऐसा माना जाता है।

उस जमाने में प्रचलित बीस देसी तथा मार्गी ताल प्रचार में थे। तत, अवनध, घन तथा सुषिर वाद्यों के भी वर्णन इस ग्रन्थ में हैं। वाद्यों का स्वरूप, वादनविधि तथा उनका निर्माण वर्णित किया गया है। वादन के गुण-दोष तथा नियम भी बताएं गएँ हैं। सुषिर वाद्यों में मुरली, शंख, सुरंगा, काहल तथा अवनध वाद्यों में मर्दल, हस्तपाट, सोलट जैसे वाद्यों के नाम भी बताएं गएँ हैं। लय का भी विस्तृत वर्णन है।

नृत्य के विशेष प्रकरण में नृत्य, नाट्य, नृत्त आदि विषयों पर उपयोगी चर्चा है। देसी, लास्य, ताण्डव, मार्गी, मण्डल, चारी मार्ग, अंग-प्रत्यंग, एकसौ करन, अंगहार आदि विषय पर समग्र विवरण है। हस्तमुद्राएँ, पदन्यास, अभिनय, नवरस तथा भावाभिव्यक्ति इन पर भी इसमे विस्तृत विवेचन है।

सोलहवि सदी तक भारतीय संगीत में विशेष रूप से कुछ बदलाव नहीं हुआ। पण्डितों ने अपने संगीत पर हुए मुसलमानी आक्रमणों को दूर करके मूलस्वरूप को पुनश्च लाना चाहा, परन्तु उसमें कोई यश प्राप्त नहीं हुआ, इतना परिवर्तन उसमे हो चुका था। यवनी संगीत के कव्वाली, गज़ल, ठुमरी रेख़ता आदि संगीतप्रकार प्रचलित थे।

पंद्रहवी सदी में मध्य भारत में ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर ने हिंदुस्तानी संगीत में अपना अपूर्व योगदान दिया। उनके द्वारा रचित मान कुतूहल इस ग्रन्थ के कारण हिंदुस्तानी संगीत उच्च कोटी के द्वार पर फिर पहुँच गया। (मुग़ल काल में औरंगजेब के दरबारी फकिरुल्ला ने इस ग्रन्थ को फारसी में रागदर्पण नाम से अनुवादित किया।) राजा मानसिंह की पत्नी मृगनयनी, बैजु तथा अनेक गुणी कलाकार इस काल के संगीत के ध्वजधारी थे। 


हिंदुस्तानी तथा कर्नाटक संगीत की कुछ रंजक बातें

 

हिंदुस्तानी तथा कर्नाटक संगीत की कुछ रंजक बातें

अपने देश का संगीत, यहाँ की सांस्कृतिक परंपरा प्राचीन है। पुराणकाल में लिखे गएँ रामायण, महाभारत सहित अन्य ग्रन्थों में वीणा, पटह, भेरी, शंख, पणव, आनक, गोमुख जैसे अनेक वाद्यों के नाम पढ़ने को मिलते हैं। यद्यपि पुराणकाल का समयकाल ईसवीपूर्व वर्षों में बता नहीं सकते, परन्तु यह तो सामान्य तौर पर समझ में आता है, कि विश्व के अन्य देशों की  तुलना में अपने देश का संगीत अधिक पुराना, तथा शास्त्राधारित है। भगवान कृष्ण के होठों पर बांसुरी, माता सरस्वती के हाथ में वीणा, भगवान शंकर की नृत्य मुद्रा तथा उनके हाथ में डमरू, नारद जी के गले में वीणा, उसी प्रकार अनेक कथाओं में उल्लेखित अनगिनत वाद्य और सामगायन के उल्लेख देख कर उसका महत्व अधोरेखित होता है। हजारो वर्षों से खड़े प्राचीन शिल्प भी इसी महत्व को दोहराते हैं। नृत्यों में उपयोगी हस्त मुद्राएँ, पदन्यास तथा वस्त्र और आभूषण, विविध वाद्य, बजानेवाले कलाकार, राजाओं के दरबार, वहाँ सुननेवाले लोग यह सारी बातें हमें आज भी ऐसे शिल्पों में देखने को मिलती हैं।

विश्व के हरेक देश की अपनी अपनी धरोहर है। इजिप्त, मेसापोटेमिया, रोम, ग्रीस, अझटेक, चीन, माया जैसी प्राचीन संस्कृतियाँ संगीत के विकास के लिए भी जानी जाती है। अरेबियन प्रथा के अनुसार बुलबुल को ईश्वर ने स्वर्ग से धरती पर संगीत प्रसार के लिए भेजा है। विश्व के सारे विज्ञानियों के अनुसार संगीत का उगम निसर्ग से ही हुआ है। आजका पाश्चात्य संगीत इन्हीं विविध संगीत पद्धतियों का अनुसरण करके लोकप्रिय बना है।

पर्शियन संगीत को मुकामात फ़ारसी’ कहा जाता है। पर्शियन धारणा के अनुसार देवदूतों ने संगीत की खोज की है। दुनिया के अन्य लोगों ने उसे उन्हीं से अपनाया है। वाद्यों की खोज तत्वज्ञों ने की है यह भी वहाँ माना जाता है। जैसे प्राचीन हिंदुस्तानी संगीतशास्त्र में छह मूल रागों का सिद्धान्त थावैसे पर्शियन संगीत बारह वर्गों में बंटा हैजिन्हें ‘मक़ाम’ कहा जाता है। उसी प्रकार उसी में से दो ‘शोबूह’ तथा चार ‘गोशूह’ बनते हैं। ‘मक़ाम’ हिंदुस्तानी रागों से, ’शोबूह’ रागिनीओं से तथा ‘गोशूह’ पुत्र और उनकी भार्याओं से मेल खाते हैं। अभ्यासकों को ज्ञात होगा कि प्राचीन भारतीय संगीतशास्त्र में षट्पुरुष रागउनकी भार्याएँ तथा उनके पुत्र और पुत्रवधुओं का वर्णन मिलता है।              

Latin भाषा में संगीत को मूसीका Mousica कहा जाता हैयूनानी में मौसिकी Mousike, फ्रांसीसी में मूसिक Mousique, पोर्तुगीज में मूसीका Musica, जर्मन में मुसीक Musik तथा इंग्लिश में म्युझिक Music इन शब्दों में संगीतकला को जाना जाता है।

 

संगीत क्या है?

गायनवादन तथा नर्तन को संगीत कहा जाता है। स्वरलय तथा ताल  

यह तीन बातें इसमें समान होती हैं। इन तीनों के साथ जब शब्दों का मिलाफ़ हो जाता है तो वह गीत बन जाता है। कविता जब सुरों के साथ बँधी जाती है तब दूध में शक्कर जैसी उसकी मिठास बढ़ जाती है।

एक बंदिश में संगीत के महत्व के बारे में गाया गया है,

जग में अगर संगीत न होता

कोई किसी का मीत न होता

ये अहसान है सात सुरों का

के दुनिया वीरान नहीं।।

  

हिंदुस्तानी संगीत की तालपद्धति मात्राओं की संख्या पर निर्भर है। जैसे चार मात्राओं का कहरवा, छह मात्राओं का दादरा, सात मात्राओं का रूपक, आठ मात्राओं का धुमाली, कव्वाली, या आधा वगैरह।

गायक या वादक को हर समय हाथ से ताल दे कर अपनी प्रस्तुति देने की कोई जरूरत नहीं होती। ताल-लय पर अधिकार हो तो तालवाद्य बजानेवाले की ओर देखते हुए गाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। हस्तक्रिया होनी ही चाहिए, ऐसी बात भी नहीं होती।

परन्तु अगर आप कर्नाटक संगीत का कार्यक्रम सुन रहे हैं, तो यह हस्तक्रिया आप जरूर देखेंगे। गायन करनेवाले कलाकार अपनी प्रस्तुति के साथ-साथ अपने ताल के आघात यानि सशब्द तथा नि:शब्द  क्रियाएँ अवश्य दिखाएंगे। इतना ही नहीं, हर मात्रा का हिसाब भी दर्शाएंगे। उसी क्रिया का यथास्थित पालन मृदंग, घट, मुर्सिंग या कंजिरी वादक करते हुए आप देख पाएंगे। पूरे समय उनका यह कार्य बिना रुके चलता है। एक तालवादक के तनियावर्तन के समय अन्य वादक तथा गायक भी केवल हस्तक्रिया करते हुए, उसे प्रोत्साहित करते हुए आप देख पाएंगे। गानेवाले की कृति की सारी लयप्रक्रिया तालवाद्य वादक अपने हिसाब से हूबहू पुनरावर्तित करते हैं। इसे श्रवण करना एक अद्भुत अनुभव होता है। यहाँ पर सारे तालवाद्यों का अनोखा नादगुण तथा वादक का कौशल्य श्रोतागण देख और सुन पाते हैं। सबका हुनर यहाँ पर कसौटी पर उतरकर आता है।

प्राचीन काल में अपने हाथ की उँगलियों पर स्वरस्थान निश्चित किए गएँ। हाथ के पंजे को वीणा का रूप दे कर हर उँगलियों के विभागों पर सप्त स्वर स्थापित करने के कारण हाथ के पंजे को गात्रवीणा’ यह नाम दिया गया। वेदों की ऋचाओं का गायन अँगूठे से उँगलियों के विभागों पर स्पर्श से स्वरदर्शित किया जाता था। यज्ञसमय पर साम गायन किया जाता था। इसी में ‘’मार्गी संगीत’’ का उद्गम था। ‘’मोक्षमार्गं निगच्छति’’ यही संगीत का उद्देश्य हुआ करता था। अधिक तर यह यज्ञ करनेवाले पुरोहितों तक ही सीमित था। दूसरी ओर केवल संगीत को अपनानेवाला एक विशिष्ट वर्ग थाजिसे ‘गन्धर्व’ कहा जाता था। उनके साथ अप्सराएँ हुआ करती थी जिनका जीवनकार्य नृत्य था। यक्षकिन्नर तथा गन्धर्व स्वर्ग में देवों के मनरंजन के लिए नियुक्त थे। इनको अतिमानवी रूप मिला था। कश्यप मुनि पिता तथा रवसामुनिक्रोधाविश्वा यह उनकी माताएँ थी। कालान्तर से यह समाज संगीत कला का व्यवसायी बन गया। अपनी रूढ़ि परम्पराओं के अनुसार जो लोकसंगीत समाज में था उसे ‘’देसी संगीत’’ कहा गया। रामायण काल से ही राजदरबारों में ‘गन्धर्व’, ‘सूत’, ‘मगध’, ‘बन्दी’, ‘नर्तिका’, ‘वारांगना’ आदि समाज के घटक संगीतव्यवसायी थे। राक्षसराज रावण अत्यन्त उच्च कोटी का संगीत मर्मज्ञ तथा कवि था। उस काल में विपंचिवल्लकीकाण्ड वीणाकर्करीकौपशीर्षाअवधारित नामक वीणाप्रकारडिंडिममृदंगनूपुरआडम्बरकरतालदुंदुभिपटहभेरीपणवमगजकुम्भचेलिकाशंखमंड़ुक जैसे अलग-अलग वाद्य प्रचलित थे। वेणुबाकूरतूणवगोधानलीसुणवभारधुनिजैसे सुषिर वाद्य थे। द्रवपभूदुंदुभीगर्गरकेतुमतविंधगज्य जैसे अवनध वाद्य थे। संगीत के प्रात्यक्षिक से धन प्राप्ति का उद्देश नहीं होता था। लव-कुश को अपने गुरु वाल्मिकी से रामकथा गायन से धन-कांचन की स्वीकृति न करने की आज्ञा थी। रामायण काल के लेखन में स्वरलयतालमूर्च्छना आदि अनेक शब्दों का जिक्र है। 

महाभारत काल में संगीत की अधिक उन्नति हो गई। राजा महाराजाओं की प्रशंसा ‘गाथा संगीत’ इस प्रकार में आती थी। समाज के सारे घटक संगीत की शिक्षा लेते थे। नटनर्तकगायकवादकसूतमगधकथावाचक ऐसे कलाकारों के विभाग थे। 

 

Tuesday, July 21, 2020

हिंदुस्तानी तथा कर्नाटक संगीत की कुछ रंजक बातें

हिंदुस्तानी तथा कर्नाटक संगीत की कुछ रंजक बातें

अपने देश का संगीत, यहाँ की सांस्कृतिक परंपरा प्राचीन है। पुराणकाल में लिखे गएँ रामायण, महाभारत सहित अन्य ग्रन्थों में वीणा, पटह, भेरी, शंख, पणव, आनक, गोमुख जैसे अनेक वाद्यों के नाम पढ़ने को मिलते हैं। यद्यपि पुराणकाल का समयकाल ईसवीपूर्व वर्षों में बता नहीं सकते, परन्तु यह तो सामान्य तौर पर समझ में आता है, कि विश्व के अन्य देशों की  तुलना में अपने देश का संगीत अधिक पुराना, तथा शास्त्राधारित है। भगवान कृष्ण के होठों पर बांसुरी, माता सरस्वती के हाथ में वीणा, भगवान शंकर की नृत्य मुद्रा तथा उनके हाथ में डमरू, नारद जी के गले में वीणा, उसी प्रकार अनेक कथाओं में उल्लेखित अनगिनत वाद्य और सामगायन के उल्लेख देख कर उसका महत्व अधोरेखित होता है। हजारो वर्षों से खड़े प्राचीन शिल्प भी इसी महत्व को दोहराते हैं। नृत्यों में उपयोगी हस्त मुद्राएँ, पदन्यास तथा वस्त्र और आभूषण, विविध वाद्य, बजानेवाले कलाकार, राजाओं के दरबार, वहाँ सुननेवाले लोग यह सारी बातें हमें आज भी ऐसे शिल्पों में देखने को मिलती हैं।

विश्व के हरेक देश की अपनी अपनी धरोहर है। इजिप्त, मेसापोटेमिया, रोम, ग्रीस, अझटेक, चीन, माया जैसी प्राचीन संस्कृतियाँ संगीत के विकास के लिए भी जानी जाती है। अरेबियन प्रथा के अनुसार बुलबुल को ईश्वर ने स्वर्ग से धरती पर संगीत प्रसार के लिए भेजा है। विश्व के सारे विज्ञानियों के अनुसार संगीत का उगम निसर्ग से ही हुआ है। आजका पाश्चात्य संगीत इन्हीं विविध संगीत पद्धतियों का अनुसरण करके लोकप्रिय बना है।

पर्शियन संगीत को मुकामात फ़ारसी कहा जाता है। पर्शियन धारणा के अनुसार देवदूतों ने संगीत की खोज की है। दुनिया के अन्य लोगों ने उसे उन्हीं से अपनाया है। वाद्यों की खोज तत्वज्ञों ने की है यह भी वहाँ माना जाता है। जैसे प्राचीन हिंदुस्तानी संगीतशास्त्र में छह मूल रागों का सिद्धान्त था, वैसे पर्शियन संगीत बारह वर्गों में बंटा है, जिन्हें मक़ाम कहा जाता है। उसी प्रकार उसी में से दो शोबूह तथा चार गोशूह बनते हैं। मक़ाम हिंदुस्तानी रागों से, शोबूह रागिनीओं से तथा गोशूह पुत्र और उनकी भार्याओं से मेल खाते हैं। अभ्यासकों को ज्ञात होगा कि प्राचीन भारतीय संगीतशास्त्र में षट्पुरुष राग, उनकी भार्याएँ तथा उनके पुत्र और पुत्रवधुओं का वर्णन मिलता है।              

Latin भाषा में संगीत को मूसीका Mousica कहा जाता है, यूनानी में मौसिकी Mousike, फ्रांसीसी में मूसिक Mousique, पोर्तुगीज में मूसीका Musica, जर्मन में मुसीक Musik तथा इंग्लिश में म्युझिक Music इन शब्दों में संगीतकला को जाना जाता है।

 

संगीत क्या है?

गायन, वादन तथा नर्तन को संगीत कहा जाता है। स्वर, लय तथा ताल  

यह तीन बातें इसमें समान होती हैं। इन तीनों के साथ जब शब्दों का मिलाफ़ हो जाता है तो वह गीत बन जाता है। कविता जब सुरों के साथ बँधी जाती है तब दूध में शक्कर जैसी उसकी मिठास बढ़ जाती है।

एक बंदिश में संगीत के महत्व के बारे में गाया गया है,

जग में अगर संगीत न होता

कोई किसी का मीत न होता

ये अहसान है सात सुरों का

के दुनिया वीरान नहीं।।

  

हिंदुस्तानी संगीत की तालपद्धति मात्राओं की संख्या पर निर्भर है। जैसे चार मात्राओं का कहरवा, छह मात्राओं का दादरा, सात मात्राओं का रूपक, आठ मात्राओं का धुमाली, कव्वाली, या आधा वगैरह।

गायक या वादक को हर समय हाथ से ताल दे कर अपनी प्रस्तुति देने की कोई जरूरत नहीं होती। ताल-लय पर अधिकार हो तो तालवाद्य बजानेवाले की ओर देखते हुए गाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। हस्तक्रिया होनी ही चाहिए, ऐसी बात भी नहीं होती।

परन्तु अगर आप कर्नाटक संगीत का कार्यक्रम सुन रहे हैं, तो यह हस्तक्रिया आप जरूर देखेंगे। गायन करनेवाले कलाकार अपनी प्रस्तुति के साथ-साथ अपने ताल के आघात यानि सशब्द तथा नि:शब्द  क्रियाएँ अवश्य दिखाएंगे। इतना ही नहीं, हर मात्रा का हिसाब भी दर्शाएंगे। उसी क्रिया का यथास्थित पालन मृदंग, घट, मुर्सिंग या कंजिरी वादक करते हुए आप देख पाएंगे। पूरे समय उनका यह कार्य बिना रुके चलता है। एक तालवादक के तनियावर्तन के समय अन्य वादक तथा गायक भी केवल हस्तक्रिया करते हुए, उसे प्रोत्साहित करते हुए आप देख पाएंगे। गानेवाले की कृति की सारी लयप्रक्रिया तालवाद्य वादक अपने हिसाब से हूबहू पुनरावर्तित करते हैं। इसे श्रवण करना एक अद्भुत अनुभव होता है। यहाँ पर सारे तालवाद्यों का अनोखा नादगुण तथा वादक का कौशल्य श्रोतागण देख और सुन पाते हैं। सबका हुनर यहाँ पर कसौटी पर उतरकर आता है।

प्राचीन काल में अपने हाथ की उँगलियों पर स्वरस्थान निश्चित किए गएँ। हाथ के पंजे को वीणा का रूप दे कर हर उँगलियों के विभागों पर सप्त स्वर स्थापित करने के कारण हाथ के पंजे को गात्रवीणा यह नाम दिया गया। वेदों की ऋचाओं का गायन अँगूठे से उँगलियों के विभागों पर स्पर्श से स्वरदर्शित किया जाता था। यज्ञसमय पर साम गायन किया जाता था। इसी में ‘’मार्गी संगीत’’ का उद्गम था। ‘’मोक्षमार्गं निगच्छति’’ यही संगीत का उद्देश्य हुआ करता था। अधिक तर यह यज्ञ करनेवाले पुरोहितों तक ही सीमित था। दूसरी ओर केवल संगीत को अपनानेवाला एक विशिष्ट वर्ग था, जिसे गन्धर्व कहा जाता था। उनके साथ अप्सराएँ हुआ करती थी जिनका जीवनकार्य नृत्य था। यक्ष, किन्नर तथा गन्धर्व स्वर्ग में देवों के मनरंजन के लिए नियुक्त थे। इनको अतिमानवी रूप मिला था। कश्यप मुनि पिता तथा रवसा, मुनि, क्रोधा, विश्वा यह उनकी माताएँ थी। कालान्तर से यह समाज संगीत कला का व्यवसायी बन गया। अपनी रूढ़ि परम्पराओं के अनुसार जो लोकसंगीत समाज में था उसे ‘’देसी संगीत’’ कहा गया। रामायण काल से ही राजदरबारों में गन्धर्व’, सूत’, मगध’, बन्दी’, नर्तिका’, वारांगना आदि समाज के घटक संगीतव्यवसायी थे। राक्षसराज रावण अत्यन्त उच्च कोटी का संगीत मर्मज्ञ तथा कवि था। उस काल में विपंचि, वल्लकी, काण्ड वीणा, कर्करी, कौपशीर्षा, अवधारित नामक वीणाप्रकार, डिंडिम, मृदंग, नूपुर, आडम्बर, करताल, दुंदुभि, पटह, भेरी, पणव, मगज, कुम्भ, चेलिका, शंख, मंड़ुक जैसे अलग-अलग वाद्य प्रचलित थे। वेणु, बाकूर, तूणव, गोधा, नली, सुणव, भारधुनि, जैसे सुषिर वाद्य थे। द्रवप, भूदुंदुभी, गर्गर, केतुमत, विंधगज्य जैसे अवनध वाद्य थे। संगीत के प्रात्यक्षिक से धन प्राप्ति का उद्देश नहीं होता था। लव-कुश को अपने गुरु वाल्मिकी से रामकथा गायन से धन-कांचन की स्वीकृति न करने की आज्ञा थी। रामायण काल के लेखन में स्वर, लय, ताल, मूर्च्छना आदि अनेक शब्दों का जिक्र है। 

महाभारत काल में संगीत की अधिक उन्नति हो गई। राजा महाराजाओं की प्रशंसा गाथा संगीत इस प्रकार में आती थी। समाज के सारे घटक संगीत की शिक्षा लेते थे। नट, नर्तक, गायक, वादक, सूत, मगध, कथावाचक ऐसे कलाकारों के विभाग थे। श्रीकृष्ण की बांसुरी, अर्जुन का बृहन्नला के रूप में नृत्य ये उस समय के उच्च संगीत के उदाहरण है। सारेगम आदि सप्तस्वर, ग्राम, मूर्च्छना, स्वरस्थान, लय आदि शब्दों के प्रमाण महाभारत में मिलते हैं।

उसी प्रकार पुराण ग्रंथों में भी संगीत के अनेक सन्दर्भ हैं। वायुपुराण में सप्तस्वर, इक्कीस मूर्च्छनाएं, तीन ग्राम, उनचास तान के प्रकार आदि का उल्लेख है। उसी तरह मार्कण्डेय पुराण में भी गायन, वादन तथा नर्तन का विवेचन है।