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Wednesday, March 31, 2021

Some Definitions

 

कुछ उपयुक्त परिभाषाएँ

संगीत

गायन, वादन तथा नर्तन इन तीनों कलाओं को मिलाकर “संगीत” कहा जाता है।

अब इसके बारे में विचार करते समय मन मेँ अन्य सारी कलाओं को भी देखना होगा। चित्रकला, शिल्पकला, मूर्तिकला फोटोग्राफी या कोई और असंख्य कलाप्रकार हैं। इनमें और गायन-वादन-नर्तन मेँ ऐसा क्या अन्तर है, कि  जिससे इन सारी कलाओं को अलग रखा जाता है?

“सूर, लय और ताल” इन तीन चीजों के कारण इन तीन कलाओं को “संगीत” के अंदर समाविष्ट किया गया है। सूक्ष्मता से देखा जाएँ तो उपर्युक्त तीनों कलाप्रकारों मेँ इन तीनों की जरूरत होती है।

हाँ, यह बात विशेष है की नर्तन मेँ इन तीनों के साथ-साथ भावाभिव्यक्ति को अतिविशेष स्थान है। यहाँ अभिनय एक अविभाज्य अंग है, गायन या वादन मेँ जिसका महत्व उतना नहीं है। इसीलिए नृत्यारम्भ करते समय यह श्लोक अवश्य गाया जाता है –

“आङ्गिकम भुवनम यस्य वाचिकम सर्व वाङ्ग्मयम।

आहार्यम चंद्रतारादि तन्नुवम सात्विकम  शिवम”॥

 

अभिनय क्या है?

इसमें दो अर्थवाले शब्द हैं। एक है ‘अभि’, जिसका अर्थ है दिशा दर्शन और दूसरा शब्द है ‘नय’ जिससे ‘ले जाना ‘ यह अर्थ प्रतीत होता है। नृत्य कलाकार अपने आंगिक, मौखिक, सात्विक तथा वेष की सहायता से दर्शकों को नृत्य के भावार्थ की तरफ ले जाते हैं। 

अध्वदर्शक स्वर

रागसमय के विभाजन के नियमों मेँ मध्यम स्वर का विशेष स्थान है। इसी कारण मध्यम को अध्व दर्शक स्वर कहा जाता है। संधिप्रकाश रागों का शुद्ध तथा तीव्र मध्यम के स्थान से सही निर्देशन यही स्वर करता है।

अल्पत्व

राग मेँ जिस स्वर को कम से कम महत्व दिया जाता है, या वर्जित किया जाता है, अर्थात उसे ‘अल्पत्व’ दिया जाता है। यह दो प्रकार से सिद्ध होता है -  

१ लंघन अल्पत्व वह होता है, जिसका प्रयोग राग मेँ बिलकुल नहीं होता। जैसे मालकन्स मेँ रे या प

२ अनभ्यास अल्पत्व वह होता है जो स्वर रागविस्तार मेँ बहुत कम मात्रा मेँ लिया जाता है। जैसे बिहाग मेँ रे या ध।

बहुत्व 

रागविस्तार करते समय जिस स्वर को  विशेष महत्व दिया जाता है वह 'बहुत्व' कहलाता है। यहांपर वादी-संवादी को छोड़ कर अन्य किसी और स्वर का विचार है। जैसे केदार में पंचम पर अधिक रुका जाता है, आलाप का प्रारम्भ किया जाता है, समाप्ती भी की जाती है। ऐसे स्वर का "अलंघन बहुत्व" होता है। इसके विपरीत वादी-संवादी स्वर प्राय: अधिक प्रमाण में लिए जाते हैं। उन्हें "अभ्यास बहुत्व" की उपाधि दी गई है। 


अक्षिप्तिका

पूर्व काल मेँ संगीतशास्त्र तथा प्रयोग सटीक हुआ करता था। गायन के मूलभूत तत्व सही रूप से निश्चित थे। स्वर, लय तथा ताल के साथ शब्दों को जोड़ कर गायन प्रयोग किया गया, तब उसे अक्षिप्तिका यह नाम दिया गया।

अनिबद्ध गायन

अनिबद्ध गायन वह होता था, जब केवल आलाप के साथ राग विस्तार किया जाता था। यह ताल या शब्द के विरहित हुआ करता था। उसमें निम्न दिए जैसे प्रकार थे –

१ रागालाप वह होता था जिसमे शास्त्रों मेँ वर्णित रागों के दस लक्षण प्रतीत होते थे।

२ रूपकालाप मेँ रागों के दस लक्षणों के अलावा गीत के विभिन्न भाग केवल आलाप मेँ दिखाएँ जाते थे।

३ अलप्ति गायन मेँ ऊपर दिए हुएँ आलापों के साथ आविर्भाव-तिरोभाव का भी प्रयोग हुआ करता था।

४ स्वस्थान नियम यह होता था, जहाँ जितना हो सके उतने ऊंचे स्वर तक आलापी करने के पश्चात पुन: अपने स्वर (सा) पर पुनरागमन करना।

 

उपज

इसका वास्तविक अर्थ है सृजित होना, निर्माण होना। ख्याल सुंदरतापूर्ण आलापी के कारण सृजित होता है। एक छोटे आलाप के दूसरे रूप से आगे और नए नए रूप गायक के नजर आते हैं। इसीसे ख्याल पूर्ण रूप से विकसित होता है। इसी पद्धति उपज अंग कहा जाता है।

 

जन्य जनक राग

रागों के वर्गिकरण में मेल या ठाट के स्वरों को स्पष्ट रूप से दर्शानेवाला जो राग होता है उसे जनक राग कहा गया है। ऐसे रागों की शृंखला में उसी विशिष्ट राग का नाम उस मेल या ठाट को दिया जाता है। जैसे कोमल ग और कोमल नि का स्पष्ट रूप दिखानेवाला सरल राग काफी है और इसीलिए उसका नाम इस ठाट को दिया गया है। ऐसे राग को जनक राग भी कहा जाता है।

ठाट से जन्म लेनेवाले रागों को जन्य कहा जाता है। ठाट के लक्षण ऐसे रागों में  होना स्वाभाविक है। अनेक बार एक जैसे दिखनेवाले राग ऐसे ठाटों में होते हैं। उदाहरण के लिए देखें तो भीमपलासी, बागेश्री और काफी इन तीनों रागों के अवरोहण में काफी समानता दिखाई देती है। एक ठाट से असंख्य जन्य राग सृजित हो सकते हैं।

 

जाति

संगीत में जाति के विविध अर्थवाले शब्द प्रचलित हैं।

 

जातिगायन

पूर्वकालीन संगीत में यह प्रकार प्रचलित था। यद्यपि रागगायन का स्वरूप अधिक बदला नहीं, कई नाम बदल गए हैं। राग के दस लक्षण अपने गायन के द्वारा स्पष्ट करते हुए जातिगायन दिखाई देता था। ये दस लक्षण इस प्रकार हैं –

ग्रह, अंश, तार, मंद्र, न्यास, अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, षाडवत्व और औडवत्व ये रागों के दस लक्षण माने जाते थे।

 

रागजाति  

राग में लगनेवाले स्वरों की संख्या पर आधारित राग निर्धारण को जाति कहा जाता है। जैसे पाँच स्वरों का औडव, छह का षाडव तथा सात स्वरों का सम्पूर्ण। इन्हीं तीन जातियों के आगे नौ प्रकार हो जाते हैं।

 

तालजाति

जाति ताल तथा लय कल्पना में भी विकसित है।

ताल की मात्राओं की गिनती के अनुसार पाँच मुख्य जातियाँ प्रचलित हैं। गायन में भी तान के प्रकार इस जाति से मेल खाते है।

चतुस्र जाति, जिसका रूप चार से विभाजित होता रहता है, जैसे ताल कहरवा, तीनताल वगैरह।

तिस्र जाति में यही काम डेढ़ या तीन मात्राओं के हिसाब से स्पष्ट होता है, जैसे ताल दादरा।

खण्ड जाति में पाँच या दस मात्राओं के हिसाब से ताल या तान प्रकार दिखते हैं जैसे झपताल की रचना।

मिश्र जाति के ताल में सात या चौदह मात्राओं का हिसाब होता है।

संकीर्ण जाति नौ या अठारह मात्राओं का रूप दर्शाती है।

 

तान

द्रुत लय में राग का विस्तार तान के विविध प्रकारों से बनता है। यहांपर आलाप और तान का परस्पर सम्बन्ध इस तरह से दिखाया जा सकता है –

राग का ताल के साथ विस्तार करते समय जब ज्यादह मात्राकाल में कम स्वर हों, तो वह आलाप बन जाता है। उसी प्रकार कम मात्राओं में अधिक से अधिक स्वर हों, तो वह तान बन जाती है। यह एक सहज दिखनेवाला रूप है।

तानों के अनेक प्रकार हैं।

सरल तान वह होती है जिसमे सीधा आरोह – अवरोह दिखाई देता है। जैसे सरेगमपधनी निधपमगरेसा वगैरह।

मिश्र तान में आरोहअवरोह का मिश्र रूप दिखाई देता है, जैसे सरेगम पमगरे गमपमगरे वगैरह।

कूट तान की रचना गुत्थीदार होती है। वक्र रूप से स्वर लिए जाते हैं, जैसे पगमरे साधपध मनिधनी गपमग रेगसारे वगैरह।

अलंकारिक तान समझने में सरलता होती है, क्यों कि प्रारम्भिक संगीतपाठ लेते समय गुरु शिष्यों को अनेक अलंकार सीखाते हैं। उन अलंकारों को यदि राग के स्वरों को गूँथा जाए तो वह अलंकारिक तान बन जाती है, जैसे सारेसारे रेगरेग गमगम मपमप......

लड़न्त तान में विविध लयकारी के पलटे समाए जाते हैं, जिनको ताल की चौखट में बिठाना पड़ता है, जैसे गगरेगगरेगरे              ममगममगमग...... वगैरह

गिटकरी तान में दो दो स्वरों की जोड़ियाँ पुनरूच्चरित की जाती है, जैसे गरे गरे मग मग पम पम धप धप .....

अचरक तान में एक ही स्वर को दो दो बार लिया जाता है, जैसे गमक में लिया जाता है। सासा रेरे गग मम पप ...

सपाट तान अति द्रुत लय में ली जाती है जो आरोही या अवरोही हो सकती है।

इसके अलावा हुनरवाले कलाकार अपने खास अंदाज़ से तानों के प्रकार बनाते हैं। पं. भीमसेन जोशी जी की अपनी एक खास तान थी, जो तार स्वरों में अति दृत गती से  सूक्ष्म कामगत करती थी।

 

पं. वेंकटमखी द्वारा रचित ७२ मेल

इस रचना में गणिती पद्धति से मेलों की रचना की गई है। प्रथम सप्तक के पूर्वार्ध के चार स्वरों को उत्तरार्ध के चार स्वरों के साथ जोड़ा जाता है। इसमें पूर्वाङ्ग से अलग अलग जोड़ियाँ बनाई जाती है। शुद्ध मध्यम के साथ इसकी व्याप्ति पूरी होने के बाद यही काम तीव्र मध्यम को लेकर किया जाता है। जिस तरह प्रथम ३६ जोड़ियाँ शुद्ध मध्यम से बनती हैं, उसी तरह तीव्र मध्यम का प्रयोग करके और ३६ जोड़ियाँ बन जाती हैं। कुल मिलाकर ७२ मेल बन जाते हैं। यहांपर हर मेलकर्ता का नाम तथा उसके आरोह अवरोह ध्यान में रखने पड़ते हैं।

पूर्वाङ्ग

१ सा रे रे म     प ध ध सां

२ सा रे ग म     प ध नि सां

३ सा रे ग म     प ध नि सां

४ सा रे ग म     प ध नि सां

५ सा रे ग म     प ध नि सां

६ सा ग ग म    प नि नि सां    

 

पूर्वाङ्ग के एकएक को उत्तरांग के सभी छह स्वरों को जोड़ने पर सब मिलाकर ३६ जोड़ियाँ बन जाती है। इसी काम को तीव्र मध्यम के साथ अगर बनाया जाएँ तो और ३६ जोड़ियाँ गणित से बन जाती है। यही है पं. वेंकटमखी द्वारा रचित ७२ मेलों की कहानी।

 

Wednesday, March 3, 2021

वाद्यों का वर्गीकरण

 वाद्यों का वर्गीकरण 

तत वितत घन सुषिर सब जानत

बाज चतुर्विध शास्त्र बखानत॥

बीन मृदंग झांज मुरली गत

भेद अनंत सकल गुनी मानत॥

 वाद्यों का वर्गीकरण

तत, वितत, घन तथा सुषिर ऐसे भारतीय वाद्योंके प्राचीन प्रकार माने जाते हैं। वाद्यों का वर्गिकरण देखते समय नीचे दिये गए मुख्य प्रकार पाये जाते हैं।

१ तन्तु वाद्य

२ अवनध वाद्य

३ घन वाद्य

४ सुषिर वाद्य

तथा आजकल के समय को देखते हुए

५ इलेक्ट्रोनिक वाद्य

 

तन्तु वाद्य अर्थ तथा प्रकार

जहां संगीत वाद्यों में तारों का प्रयोग होता है, उन्हें तन्तु वाद्य कहा जाता है। मिज़राब तथा प्लेक्ट्रम जैसी चीजों की सहायता से ऐसे कई वाद्य बजाए जाते हैं, तो कई वाद्य ‘बो’ की सहायता से बजाए जाते हैं। कुछ वाद्य छोटी आघात करनेवाली लकड़ियों की सहायता से बजाए जाते हैं।

एकतन्त्री वीणा या इकतारा से लेकर शततन्त्री वीणा तक असंख्य प्रकार तन्तु वाद्यों में हैं। गिटार, वायलिन, सितार, सरोद, सारंगी, संतूर जैसे अनेक वाद्य इस श्रेणी में आते हैं।

 

अवनध वाद्य अर्थ तथा प्रकार

अवनध वाद्य वह तालवाद्य होते हैं जिनपर चमड़ा मढ़ा जाता है। इसमे असंख्य प्रकार हैं। छोटीसी दिमड़ी से लेकर बड़े बड़े ढोलों तक के वाद्य इस श्रेणी में आते हैं। इनमे से कई वाद्य उँगलियों से, कई दोनों पंजों से तथा कई लकड़ी की सहायता से बजाए जाते हैं।

कई वाद्यों पर स्याही मढ़ी होती है, तो कई वाद्यों पर आटे का लेप चढ़ाया जाता है। कई अवनध वाद्य बिलकुल पतली छड़ियों से बजाए जाते हैं, तो बड़े ढ़ोल मोटी लकड़ियों से बजाए जाते हैं।

       ढ़ोल-ताशा, सम्बल, ढोलक, ढोलकी, मादल, चंडा जैसे बहुत सारे तालवाद्य लोकसंगीत में बजाए जाते हैं। मृदंग, पखावज, तबला, तविल जैसे वाद्य शास्त्रीय संगीत में बजाए जाते हैं। इनके मुख बकरी, बैल जैसे जानवरों की खाल से मढ़े जाते हैं, तथा उनकी बद्धियाँ भी उन्हीं के चमढ़े से बनी रस्सी से बनती हैं। फिल्मी संगीत में बोंगों, कोंगों, जाझ ड्रम सेट, जेम्बे जैसे तालवाद्यों का भरपूर प्रयोग होता है। यह सारे वाद्य भारतीय संगीत पद्धति के अनुसार अवनध वाद्यों की श्रेणी में आते हैं।

 

घन वाद्य

दो चीजों के टकराव से जो मधुर ध्वनि उत्पन्न होता है उससे संगीत वाद्यों की श्रेणी में एक और वर्गिकरण मिल जाता है। इनमें   धातुओं की चीजें होती हैं। सबको विदित उदाहरण होते हैं स्कूल की बेल, मंदिर की घण्टी, चर्च की बेल्स, ट्रायंगल, चिमटा, झुनझुना आदि। ये सारे वाद्य मुख्य तालवाद्यों की सहायता में काम आते हैं। घनवाद्यों में स्वरनिर्मिति करनेवाले वाद्य होते हैं, पियानो, जलतरंग, काष्ठतरंग, जायलोफोन आदि वाद्य।                   

 

सुषिर वाद्य

संगीत निर्मिति करनेवाले वो वाद्य जिसमें हवा के प्रयोग से स्वरनिर्माण होता है। शंख, सीटी, सींग, पोंगु, पुंगी, अलगुजा, भोंपू जैसे वाद्य इस श्रेणी के मूल वाद्य हैं। शहनाई, बिगुल, ट्रंपेट, साइक्सोफोन, क्लेरिनेट, नादस्वरम जैसे वाद्य आमतौर पर रस्ते में भी सुनने को मिलते हैं। हारमोनियम, अकोर्डियन, बांसुरी यह वाद्य भी सुषिर वाद्य कहलाते हैं।

इनमें से अनेक वाद्य बिना किसी सहायक चीज के बजते हैं जैसे बांसुरी, बिगुल, शंख, सींग जैसे वाद्यों में अन्य कोई चीज नहीं होती।

क्लेरिनेट, साइक्सोफोन, शहनाई जैसे वाद्यों में माउथपीस तथा उसके साथ रीड का भी इस्तेमाल होता हैं। हारमोनियम में भी रीड का इस्तेमाल महत्वपूर्ण है।  

 

इलेक्ट्रोनिक वाद्य

इक्कीसवी सदी में पारंपरिक वाद्यों के साथ-साथ नए इलेक्ट्रोनिक वाद्यों का समावेश वाद्यों के वर्गिकरण में होना जरूरी है। शास्त्रीय  संगीत में सब से अधिक मात्रा में उपयोग होनेवाला वाद्य है इलेक्ट्रोनिक तानपुरा। इसी के साथ विविध स्वरों से मिलजुलनेवाला तालतरंग जैसा वाद्य आवश्यक सारे तालों के लिए गायक-गायिकाए उपयोग में लाते हैं। रियाज के, रिकार्डिंग के या कार्यक्रम के समय चुने हुए रागों का सुंदर स्वरमेल अपनेआप बजानेवाला ऐप्प भी आजकल कलाकारों की सेवा में उपस्थित है। आजकल के आवागमन के कठिन समय में ठीक समय पर रियाज करने की अनुकूलता इस वाद्य से प्राप्त हो जाती है। सहयोगी वादक कलाकार के प्रत्यक्ष आ जाने तक सही रियाज होने के लिए ऐसे वाद्य वरदान जैसे प्रतीत होते हैं। तबला वादकों के लिए हर ताल और लय के तैयार नगमें भी ऐसे ऐप्प में मिल जाते हैं।

अनेक वर्षों से भारतीय फिल्मी संगीत में सिंथेसाइजर, ओक्टोपैड, इलेक्ट्रिक गिटार तथा अनेक सुविधाओं से सुसज्जित की बोर्ड्स स्वरमेल इन वाद्यों से निर्माण हो जाता है। मेलड़ी और हार्मोनी के नाना रंग सुनने को मिलते हैं।

आजकल के संगीत निर्माण में कंप्यूटराइजड़ म्यूझिक ने सब गायक-वादकों की सर्जनशक्ति को आव्हानित किया है। हररोज नए शोधित सॉफ्टवेअर्स ने मानवी मस्तिष्क की निर्माण क्षमता को कमाल स्तर तक पहुंचाया है। दुनिया के एक कोने में बैठकर गाए हुए गीत का आवश्यक सारा साजशृंगार स्वरताल के साथ दूसरे कोने में बैठा हुआ अरेंजर बखूबी से कर देता है। चंद घण्टों में ही एक बेजोड़ संगीत कलाकृति रसिकों के सम्मुख आ पहुँचती है। यह सब इलेक्ट्रोनिक वाद्यों का कमाल है, तथा वह वाद्यों के पारम्परिक वर्गिकरण को नया आयाम देता है।    


Thursday, February 18, 2021

पंडितजींचे गाणे…महाकुंभमेळा

 

पंडितजींचे गाणे…महाकुंभमेळा     
 



अफाट ताकदीच्या जिगरबाज उस्तादी घरंदाजीच्या मस्तीत उघड आव्हाने देऊन गाणार्‍या   गवयांचा विसाव्या शतकाच्या आरंभापर्यंत एक जमाना होता. ’खरे गाणे आपलेच’ असे म्हणुन आपल्या घराण्याचे नाक वरच राहिले पाहिजे, असा वरचढ पवित्रा ठेवणार्‍यांचा आणि प्रतिस्पर्धि गुणवान गायकाचा उपमर्द, तर कधि जीवघेणा प्रयोग करविणार्‍यांचाही तो जमाना होता. संगीतकलेचा उत्कर्ष होत असताना कलावंतांचाही उत्कर्ष होत असे. पण अशा हटवादी उस्तादांच्या आणि त्यांच्या चेल्यांच्या कुकर्मामुळे अन्य घराण्यांच्या उभरत्या कलावंतांच्या आयुष्याच्या झालेल्या सत्यनाशाचा तो जमाना होता. राजघराण्यांचा आश्रय असणारा तो काळ संगीत घराण्यांच्याही उत्कर्षाचा होता. आपल्या घराण्याचे गाणे इतर कुणाही ’ऐर्‍यागैर्‍याच्या’ कानीही पडू नये म्ह णून अनेक क्लृप्त्या लढविणारे त्यातले उस्ताद शिष्याची पारखही अनेक वर्षे करीत. त्यांचा वेळोवेळी पाणउताराही करीत. ’सर्व प्रकारची’ सेवाही करुन घेत.

अशा काहीशा विचित्र वातावरणात राहून चिकाटीने, धैर्याने आणि समर्पणवृत्तीने ज्यांनी ज्ञान ग्रहण केले त्यात पं. बाळकृष्णबुवा इचलकरंजीकर, पं. भास्करबुवा बखले, पं रामकृष्णबुवा वझे अशा अनेकांचे नाव संगीताच्या इतिहासात फार मोठ्या मानाचे आहे. बाळकृष्णबुवानी देवजीबुवा, वासुदेवबुवा तसेच हद्दुखांसाहेबांचे चिरंजीव महम्मदखां यांच्याकडून मोठ्या कष्टाने गायन प्राप्त करून घेतले. त्या काळात अशा गुरुतही आपसात बेबनाव असताना. भास्करबुवांची कीर्ति अफाट होती. पण त्यांनी ज्या तीन महानुभावांकडून विद्या प्राप्त करुन घेतली ते तिन्ही उस्ताद वेगवेगळ्या घराण्यांचे होते. फैजमहम्म्दखां, नत्थनखां आणि अलादियाखां या श्रेष्ठांकडुन गायनकला प्राप्त करुन घेतलेल्या बखलेबुवांनी एका गुरूने अपमान केल्यावर त्यांच्याकडून मिळविलेल्या एकाही अंगाचा तसूभरही समावेश न करता अन्य दोन्ही गुरुंकडून प्राप्त झालेली विद्या त्यांच्या समक्ष भर सभेत सादर केली. हे थोरपण अन्यत्र कुठेही नाही. रामकृष्णबुवा असेच अनेक लहरी बादशहांकडे शिकले. उस्ताद निसार हुसेनखां, महम्म्दखां, सादिक अलीखां अशांकडे त्यांनी अनेक कष्ट सहन करुन अफाट विद्या मिळवली.
आमच्या जन्मापूर्वीच्या या गोष्टी आहेत. संगीताचा इतिहास जाणून घेताना यांचे दर्शन होते. पण आजच्या काळात अशी किती उदाहरणे आपल्याला दिसतात?
हा प्रश्न पडताच डोळ्यासमोर सरळ उभे राहतात स्वराधिराज पं. भीमसेन जोशी. लहान वयात गुरूच्या शोधात हिंडहिंडून, अनेक अपमान सहन करुन, प्रसंगी विनातिकिट प्रवास करुन ते जालंधर येथे पोचले. तिथल्या हरिवल्लभ संगीत सम्मेलनात गाण्यासाठी आलेल्या पं. विनायकबुवा पटवर्धनांनी त्यांची व्यथा जाणून त्याना योग्य गुरुचे नाव सुचविले. आपल्या गावाजवळच असलेल्या कुंदगोळ येथे पं. सवाई गंधर्वांच्या जवळ आपल्याला गाणे शिकायला मिळणार या आनंदाबरोबरच त्यांना आणखी एक मनस्वी आनंद मिळाला.
लहानपणी येता जाता ग्रामोफोनच्या दुकानात नित्यनेमाने ऐकू येणारा उ. अब्दुल करीम खांसाहेबांचा आवज त्याना वेडावुन सोडीत असे. असे आपल्याला गायचे आहे, ही दुर्दम्य इच्छा त्याना होत असे. सवाई गंधर्वांकडे त्याना ते मिळाले हा त्या आनंदाचा उत्तरार्धच!
भीमसेनजी श्रोत्यांसमोर प्रथम गायले ते आपल्य गुरूच्या षष्ठ्यब्दिप्रसंगी १९४६ साली. पुण्याच्या हिराबागेतला तो कार्यक्रम संगीतसृष्टीच्या इतिहासात सुवर्णाक्षरानी लिहिला गेला.  ’भारतरत्न’ भीमसेनजींच्या उमेदीचा तो मैलाचा दगड होय. त्यावेळी ते मियामल्हार गायले. ते त्यांचे गायन ऐकताच त्याठिकाणी आलेल्या देशभरातील संगीतप्रेमीनी त्याना तात्काळ आमंत्रणे दिली. याच क्षणी एका विलक्षण ताकदवान, बुद्धिमान आणि नादमधुर गायकाने अखिल हिंदुस्थानात आपली मुद्रा विराजमान केली.


याच काळात बेळगावातही त्यांचे गायन झाले १९४७-४८ साली. त्यवेळी येथे कर्नाटक म्युझिक सर्कल कार्यरत होते. रामदेव गल्लीतील कट्टी फोटो स्टुडिओच्या जागेत कार्यक्रम होत. हणमंतराव गुत्तीकर कामकाज पाहत. तबलावादक व्यंकण्णा कुप्पेलूर घरोघरी हिंडून एक एक रुपया मिळेल तसा गोळा करीत. जुने रसिक अजुनही ही आठवण सांगतात.
त्याचप्रमाणे आर्टस सर्कलने १९५२-५३च्या दरम्यान त्यांचे गाणे केले. बेळगावच्या जाणकार श्रोत्यांबद्दल त्याना आपुलकी होती.

 

भीमसेनजीनी १९७८मध्ये ’संतवाणी’ गाण्यास आरंभ केला. विलक्षण लोकप्रियता लाभलेल्या या कार्यक्रमाला बेळगावात तीनही वेळा उदंड प्रतिसाद लाभला.
९ आक्टोबर १९८१ रोजी कलामंदिर येथे झालेला संतवाणीचा कार्यक्रम समस्त बेळगावकर रसिकांवर भक्तिरसाचा वर्षाव करुन गेला. बेळगावचे सुप्रसिद्ध गायक अनंत तेरदाळ यांच्या गंडाबंधन प्रसंगी म्हणजेच १२ मार्च १९८३ रोजी पंडितजींनी केलेले भाषण त्यांच्या गायनाइतकेच दिलखुलास होते. त्यावेळी त्यानी गाइलेला ’तोडी’ माझ्यासारख्या त्यावेळच्या उभरत्या गायकांच्या आणि असंख्य रसिकांच्यासाठी एक अवीट वस्तुपाठच होता. त्यानंतरही त्यांचे इथे कार्यक्रम झाले. प्रत्येकवेळचे आणि प्रत्येक ठिकाणचे त्यांचे गाणे म्हणजे महाकुंभमेळाच असे. महावीर भवनसारख्या मोठ्या सभागृहातसुद्धा उभे राहून ऐकण्यासाठी जागा मिळत नव्हती. अशी प्रभावळ असणारे हे व्यक्तिमत्व सूर्यदेवाच्या आराधनेदिवशी रथसप्तमीच्या दिवशी जन्माला आले हे महत्वाचे.

प्रथम वर्णन केलेल्या संगीत वातावरणाचा विचार केल्यावर पंडितजींच्या थोरपणाचे महत्व नक्कीच कळेल.

 

आजच्या काळात घराणेदार गाण्याची गुप्त विद्या इंटरनेटमुळे यू ट्यूब सारख्या अन्य आधुनिक साधनांमुळे तितकी दुर्मिळ राहिलेली नाही. घ्रराणे ’जपण्यासाठी त्यावेळसारखा अट्टाहास करणारी मंडळीही आज नाहीत. घरंदाजीच्या आधुनिकपणाची सुरुवात असण्याच्या काळात पं. भीमसेन जोशींच्या गायनाचीही सुरुवात झाली. ’एस्टब्लिश्ड’ घराणेदार गायकांच्या आणि तत्सम जिगरबाज उस्तादी परंपरेच्या छाताडावर बसून पंडितजीनी किराना घराण्यात आपली एक ’खास’ गायकी बनवली. त्यांच्या दीपस्तंभाचे तेज ’विश्वंभर’ बनले आणि याकडे नजर टाकण्याची शक्ति मिळवु पाहणार्‍या त्यांच्या शिष्यानी त्यातील एक किरणतरी मिळावा यासाठी अहोरात्र मेहनत केली. जे साध्य झाले त्यातच इतिकर्तव्यता मानली.


अमर्याद शारीरिक शक्तीचे, ठाव न लागणार्‍या रागवैभवाचा शोध घेणार्‍या त्यांच्या ऊर्मीचे आणि सहजसुंदर बंदिशींच्या द्वारे उलगडणारे पंडितजींचे गाणे कुणी पेलतो म्हणून पेलणारे नव्हे. बैजु-तानसेन बद्दल माहित नाही, गंधर्वलोकीचे वा स्वर्लोकीचेही ठाऊक नाही, पण तांनपुर्‍याच्या घनगंभीर नादात आत्मचिंतनात मग्न झालेली ती ’भीमकाया’ प्रत्यक्ष पाहून आणि पुढे त्यांच्या स्वरधारेत ’कायावाचामने’ चिंब भिजून ज्यानी आपले जीवन धन्य केले, ते संगीत रसिक पंडितजींचे जन्मोजन्मीचे ऋणीच राहतील!


Monday, February 8, 2021

शास्त्रीय संगीत काल, आज आणि उद्या

  शास्त्रीय संगीत काल, आज आणि उद्या

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीताबद्दल बोलत असताना वरील वाक्याचा नेहमीच उपयोग होत आला आहे. या विचारामागे अनेकजणांची प्रतिक्रिया चिंतादर्शक स्वरूपाचीच असते. या अनेकजणात संगीताचे खरे रसिक असतात, कलाकार असतात, कलेचे जाणकार आणि अभ्यासकही असतात. शिवाय त्यांनी संगीताचा सुवर्णकाळ पाहिलेला असतो. संगीतकलेतील महान उपासकांचे जीवन, त्यांची जडण घडण आणि उत्कर्ष त्यांनी पाहिलेला असतो. अर्थात यातली श्रीमंती दर पिढीनंतर बदलत असते. त्यातले आदर्श बदलत जातात. महानतेचे मानदंड सुद्धा बदलत जातात. परंतु कलेचे असामान्यत्व जाणणारे असे या समूहातले लोक असतात. आज ज्यांची नावे या क्षेत्रात उत्तुंगतेच्या शिखरावर आहेत त्यांचे गुरुजन अशा लोकांच्या स्मरणात असतात.     

तसे पाहता असे वाक्य उच्चारून सामान्य लोकांसमोर संगीत सृष्टीचे एक वेगळे चित्र उभे करण्याचा प्रयत्न करणारेही लोक अधिक असतात. अशा लोकांसमोर केवळ त्यांच्या पिढीतल्या श्रेष्ठ कलाकारांची नावे असतात. परंतु अशा लोकांचे शास्त्रीय संगीताचे ज्ञान वाखणण्यासारखे असते असेही नाही. यामध्ये तथाकथित समाजसेवक, आश्रयदाते, लेखक, पत्रकार, विविध पक्षनेते, पुढारी वगैरे लोक असतात, ज्यांना निरनिराळ्या प्रसंगी जाहीर वक्तव्य करावे लागते. अशा लोकांच्या संभाषणामध्ये हा विषय प्राधान्यतेने येत असतो. याचा अर्थ ही त्यांची मते अधिकृत किंवा अभ्यासपूर्ण असतात असेही मानण्याचे कारण नाही.

संगीताच्या अभ्यासकाला हा प्रश्न जेव्हा पडतो तेव्हा त्याच्यासमोर आपण स्वतः केलेल्या अभ्यासाचा, महान गुरूंकडून अथकपणे मिळवलेल्या ज्ञानसंपदेचा, अन्य सहकारी कलाकारांनी घेतलेल्या मेहनतीचा, मिळालेल्या मार्गदर्शनाचा, त्याचप्रमाणे या सर्वांच्या आदर्श गुरुजनांच्या विद्वत्तेचा दृष्टीकोण असतो. एखाद्या रागाचा सर्वांगीण विस्तार करत असताना या विद्वान कलाकारांनी त्याकडे किती विशाल दृष्टी ठेवून पाहिले आणि त्या प्रत्येकाच्या नजरेमध्ये किती विविधता होती हे सर्व या अभ्यासकाच्या डोळ्यासमोर तरळून जाते. जसे कुमारजी म्हणत, रागाकडे समोरून, पाठीमागून, डावीकडून, उजवीकडून एवढेच काय तर वरूनसुद्धा पाहता आले पाहिजे. एकाच प्रकारे गायन करणे हा केवळ पीठ दळण्याचा प्रकार आहे. याला परंपरा, घराणे जपणे वगैरे म्हणत असतील तर ती एक भली मोठी चूक आहे.

अर्थात कुमारजी हे अत्यंत वेगळा विचार घेऊन श्रोत्यांसमोर आलेले सतत चिंतनशील असे गायक होते. इतरांना त्यांच्या त्या मनोवृत्तीशी जोडता कामा नये. किंबहुना आपल्या शिष्यांनी आपल्यासारखेच गावे, आपलेही घराणे निर्माण व्हावे अशी त्यांची मुळीच अपेक्षा नव्हती. उलट याच गोष्टीची त्यांना घृणा होती.

कुमारजींच्या उदाहरणावरून इथे एवढेच सांगायचे आहे की घराणे आणि परंपरेच्या पिढीजात साखळीने अनेक शतके कित्येक पठडया जोपासल्या गेल्या. त्या प्रत्येकाच्या नजरेच्या स्वातंत्र्याने सुंदरतेचे वेगवेगळे परिमाण जोपासले जाऊन सुसंस्कृत समाजाची ओळख निर्माण झाली. प्रत्येक घराण्यागणिक शेकडो गुणी कलाकार होऊन गेले आणि शिष्यांची अतूट शृंखला निर्माण झाली. त्यातून उत्तमतेची श्रवणकलासुद्धा विकास पावली. संगीताचे शास्त्र लोकांना कळू लागले, त्याशिवाय संगीताचे सौंदर्यशास्त्रसुद्धा निर्माण झाले. संगीत कसे ऐकावे याचाही विचार पुढे आला. सर्वात महत्वाचे म्हणजे संगीतकलेपासून होणारे शारीरिक, मानसिक फायदे या गोष्टींचाही ऊहापोह सुरू झाला. उत्तम संगीतामुळे मनुष्यासह प्राणी, वनस्पती आणि सामाजिक समूहजीवनावर होणार्‍या सुपरिणामांचेही शास्त्र पुढे आले.

आजचे शास्त्रीय संगीत हे अशा रीतीने शास्त्रीय (सायंटिफिक) विचार करणार्‍या, संगणकीय मेंदूने विचार करणार्‍या पिढीचे आहे. ह्या दृष्टीने विचार केला तर उद्याचे संगीत हे डिजिटल युगाला शोभणारे आणि नव्या उपकरणांचे सहाय्य घेऊन आपल्या ज्ञानाचा विकास करू पाहणार्‍यांचे आहे. यात अनवट वयातल्या मुलांनी जुनाट ख्यालाची नवी तंत्रे शोधून बुजुर्ग घरंदाज कलाकारांना नवे पाठ दिले तर काही आश्चर्य वाटायला नको.       

 

नंदन हेर्लेकर 

Sunday, January 24, 2021

स्वरादित्याचे आवर्तन स्तब्ध !!!

 स्वरादित्याचे आवर्तन स्तब्ध 

हा लेख भारतरत्न पंडित भीमसेनजी गेले तेव्हा बेळगावच्या ''तरुण भारत'' मध्ये लिहिला होता. 

मला वाटते 'त्या' दिवसाच्या या लिखाणाच्या प्रयोजनामध्ये आणि आजच्या घडीला हे पुनः प्रसिद्ध करण्याच्या प्रयोजनामध्ये तसा काहीच फरक नाही आहे.   

             हिंदुस्थानी संगीताचा तळपता सूर्य असे ज्यांचे थोड्याच शब्दात वर्णन करता येईल असे "खरोखरीचे" भारतरत्न पंडित भीमसेन जोशी यांचे देहावसान अवघ्या संगीत सृष्टीला मोठाच हादरा देणारे आहे. वयाची सरणारी पाने उलगडत असताही त्यांचा हिशेब न ठेवणारे हे असामान्य व्यक्तिमत्व वयाच्या ८६व्या वर्षांपर्यंत अखंडितपणे गात राहिले. 'मिले सूर मेरा तुम्हारा तो सूर बने हमारा' हा एकात्मतेचा संदेश दूरदर्शन च्या माध्यमातून त्यांनी दिला. त्याहीपूर्वी अनंत काळापासून स्वरधारेच्या माध्यमातून पिढ्यानपिढ्या चालत आलेल्या गौरवशाली भारतीय संगीताच्या महान चक्रवर्तीचा वारसा त्यांनी आपल्या स्वरशक्तीने त्रिलोकात गर्जविता ठेवला. भीमसेन या नावाला शोभेल अशी त्यांची स्वर शक्ती होती. 'भाव भक्ती भीमा उदक से वाहे' ही पंक्ती म्हणत असताना त्यांच्या उच्चारण शक्तीमुळे स्वर शक्तीही उत्तुन्गतेचे शिखर गाठायची. त्यांचा 'षडज' सप्तस्वरांची उत्पत्ती करून देण्याच्या आपल्या व्याख्येपलीकडे जाणारी एक अमोघ प्रवृत्ती होती. घरंदाजी गायकीचा रसपूर्ण प्रवास त्यांच्या स्वतःच्या स्वरविलासामुळे 'किराना' परंपरेच्या अत्युच्च शिखरावर पोचला.




              तसे पाहता त्यांच्यावर बालपणी असलेला उ. अब्दुल करीम खान साहेबांच्या गायकीचा प्रभाव सवाई गंधर्वांच्या कडून मिळालेल्या तालमीतून अधिक प्रखर झाला. त्यांची विलम्पत ही किराना घराण्याच्या सर्व बारकाईचा ठाव घेणारी होती. पण गगनाचा ठाव घेणाऱ्या अतितार स्वरावरील फिरत, विद्युल्लतेच्या वेगाने तिन्ही सप्तकांतून अविरत कोसळणारी त्यांची 'भीमसेनी' तान आणि मध्य लयीच्या पाच-पाच आवर्तनांची त्यांची न थांबलेली तानक्रिया हे सारे किराना परंपरेत कुठेही न दिसणारे त्यांचे स्वतःचे धन होते. अशा अजस्र तानक्रियेत त्यांचा श्वास 'नेमका' कुठे येतो हे अचंबित श्रोत्या पुढचे मोठेच प्रश्नचिन्ह असे.
              वैदिक काळखंडामध्ये 'आसेतु हिमाचल' भारतीय संगीत शास्त्र वैभवाप्रत गेले. भरत, कश्यप, मातंग अशा महा मुनिपासून कोहल, दत्तील, वेण, नान्यभूपाल, भोज, सोमेश, अभिनव गुप्त, लोल्लत, उद्भट, शारंगदेव असे महान शास्त्रकार संगीतशास्त्राचा परमोद्धार करून गेले. संगीतशास्त्राला देवत्व प्राप्त झाले. ते भक्तिमार्गाचे मोठेच साधन बनले. पण बाराव्या शतकानंतर  संगीताची कांही दृष्ट्या अधोगती सुरु झाली. शास्त्राचा ह्रास होऊ लागला. संगीताचे देवस्थान नष्ट झाले. कला राज घराणी आणि सरदार-दरक्दारांची बटिक बनली. एकोणिसाव्या शतकाच्या अंतापर्यंत ही  स्थिती अशीच राहिली. कलावंत व्यसनी, रंगीले, लहरी आणि व्यावहारिकदृष्ट्या कफल्लक राहिले, परमोच्च संगीतगुण असणारे ज्ञानी गुरु शास्त्र विसरले. अशा काळात कलेला आणि शास्त्राला पुनर्वैभव प्राप्त करून दिले ते 'विष्णू द्वयानी', म्हणजेच विष्णू नारायण भातखंडे आणि विष्णू दिगंबर पलुस्कर यांनी. संगीताचे नवे युग सुरु झाले. 

              याच काळात पं. भीमसेन जोशींच्या रूपाने एक ध्रुव तारा अवतीर्ण झाला. त्यांचे स्थान केवळ प्रसिद्ध गवई म्हणून नव्हे तर मैफिलीच्या बाबतीत एकमेवाद्वितीय स्वरनायक म्हणून त्यांची ख्याती देश-विदेशात झाली. सहा-सहा महिने त्यांचे advance बुकिंग नेहमीच असे. आजच्या काळात ज्याला 'लीजींड' म्हणता येईल असे हे चिरतरुण व्यक्तिमत्व होते. भाषा, प्रांत, देश, धर्म, समाज रूढी आणि सर्व तथाकथित राजकीय, आंतरराष्ट्रीय बंधने या सर्व मर्यादा पार करून सात समुद्रपार गेलेले हे अस व्यक्तिमत्व पुन्हा होणे नाही. कंठात अक्षय स्वरांचा खजिना साठवलेला आणि उत्कंठीत श्रोत्यांच्या तना-मनावर उदारपणे उधळलेला तो एका अजब चमत्कार होता. त्यांचे गायन ऐकून बाळांचे तरुण आणि तरुणांचे वृद्ध झालेले श्रोते लक्षावधी असतील. पण त्यांचे स्वरदेणे कधीच विद्ध झाले नाही.
                      त्यांची कोणतीच मैफल कधीच म्लान झाली नाही हा ही एक चमत्कारच. त्यांच्यावर अनेकांनी अनेकवेळा सातत्याने स्तुतिसुमने उधळली. अनेकांनी टीकाही केल्या. त्यामुळे त्यांचे कधी अडले नाही व कधी ते फुशारकीने हुरळूनही गेले नाहीत. 'आज मूड लागत नाही' चाही त्यांनी कधी आधार घेतल्याचे ऐकिवात नाही.

त्यांचा संचार आणि संपर्क अफाट होता. त्या संपर्काला त्यांच्यातील देवत्वाचा स्पर्श होता. त्यामुळेच त्यांच्यातील सघटन कौशल्य सवाई गंधर्व संगीतोत्सावाच्या आयोजनात दिसले. हजारोंच्या संख्येने येणाऱ्या श्रोत्यांमध्ये त्यांच्या प्रभावळीचा दरारा असे. आयोजनात कुठेही ढिसाळपणा नसे  व तक्रारीला जागा नसे. आज जागोजागी होणारी संगीत संमेलने ते उदाहरण समोर ठेवूनच आयोजिली जातात. त्याहून पुढे जाऊन म्हणायचे तर 'सवाई गंधर्व महोत्सवात गायला मिळावे' ही उत्कट प्रेरणा नवकलाकाराच्या मनी यावी असे ते महा मेळ्याचे स्वरूप केवळ त्यांच्यामुळेच बनले. 'हिंदुस्थानी संगीतात मुसलमानी कलावंतांचे वर्चस्व आहे'  असे म्हणत असतानाच "हिन्दुओ में क्या, मुसलामानो में भी ऐसा गवय्या नही है" असे उद्गार काही ठराविकच गवयासाठी मोठमोठ्या उस्तादांनी काढले. आजच्या काळात भीमसेनजींचे नाव त्या यादीत अग्रस्थानीच होते. 

            गायकी आणि  नायकी या दोन्हीमध्ये त्यांचे संगीतमूल्य अतिश्रेष्ठच होते. संगीतनिर्मितीही त्यांनी केली. 'धन्य ते गायनी कला' यासारख्या नाटकांना त्यांनी दिलेल्या चाली घरंदाजी गायनाचा परिचय करून देणाऱ्या आहेत. 'हे करुणाकरा ईश्वरा कृपादान मज दे' हे गीत 'मारवा' समजण्यासाठीचे एक उत्कट पण अवघड उदाहरण आहे. मराठी संतवाणी, कन्नड दासरपदगळू ही तर प्रसिद्ध आहेतच, पण त्यांनी गायिलेली कबिरांची, तुलसीदासांची, ब्रह्मानंदाची तसेच अनेक नवीन कवींची हिंदी पडे न मोजता येण्याइतकी आहेत. लता मंगेशकरांसह म्हटलेली पं. नरेंद्र शर्मांची त्यांची हिंदी पदे अतिशय लोकप्रिय आहेत.
            पंडित भीमसेन जोशी हे नाव संगीतकलेच्या भाव विश्वात नित्यच राहील. संगीतात रमणाऱ्या, त्या अमर्याद सुरसागरात आत्मानंद मिळवू पाहणाऱ्या रसिकांना हे प्रातः स्मरणीय राहील, पिढ्यानपिढ्या ही स्वरनौका संत्रस्त जनांना सुखवीत राहील, स्वरमयी कलावंतास प्रेरक राहील.


नंदन हेर्लेकर